दक्षिण भारत एक्सपोज़र विज़िट: सीख, अनुभव और छत्तीसगढ़ के पर्यटन विकास का विज़न

सर्वप्रथम मैं छत्तीसगढ़ के माननीय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी एवं जनसंपर्क विभाग के सभी अधिकारियों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, जिनके मार्गदर्शन, पहल और समन्वय के कारण यह अध्ययन यात्रा संभव हो सकी।

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित एक्सपोज़र विज़िट मेरे लिए केवल एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि सीख, प्रेरणा, अध्ययन और आत्ममंथन का सशक्त अवसर रही। 7 दिवसीय इस अध्ययन प्रवास के दौरान हमें दक्षिण भारत के प्रमुख शहरों — ऊटी, मैसूर, बेंगलुरु तथा तिरुपति — का भ्रमण करने का अवसर मिला। इस यात्रा में 14 पत्रकार साथियों और 5 जनसंपर्क अधिकारियों के साथ बिताया गया समय अत्यंत सहयोगपूर्ण, आत्मीय और यादगार रहा।
इस पूरे भ्रमण के दौरान हमने विभिन्न राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्थाओं, विशेषकर पर्यटन क्षेत्र में विकसित आय के स्रोतों, प्रबंधन पद्धति और स्थानीय सहभागिता को नज़दीक से देखा और समझा। यह अनुभव अत्यंत प्रेरणादायक रहा। इससे यह स्पष्ट हुआ कि योजनाबद्ध प्रयास, स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग और दूरदर्शी सोच के माध्यम से पर्यटन को मजबूत आर्थिक आधार बनाया जा सकता है।

इसी दौरान कुछ पर्यटन स्थलों पर विदेशी पर्यटकों से संवाद का भी अवसर मिला। उनसे बातचीत के दौरान मैंने छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, जलप्रपातों, वन क्षेत्रों, धार्मिक स्थलों और आदिवासी संस्कृति के बारे में जानकारी साझा की। विदेशी पर्यटकों ने छत्तीसगढ़ को एक “अनदेखा लेकिन संभावनाओं से भरा राज्य” बताया, जिससे यह विश्वास और मजबूत हुआ कि यदि हमारे प्रदेश का सही प्रचार-प्रसार हो, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी छत्तीसगढ़ की पहचान बन सकती है।

यात्रा के दौरान एक छोटी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण बात ने विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया — प्रत्येक प्रमुख पर्यटन स्थल पर स्वच्छ और सुव्यवस्थित शौचालयों की व्यवस्था देखने को मिली, जहाँ नाममात्र (लगभग 5 रुपये) शुल्क लिया जा रहा था। इससे स्वच्छता का स्तर लगातार बना रहता है और रखरखाव व्यवस्थित ढंग से हो पाता है। इस व्यवस्था से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है, जिससे स्वच्छता और आजीविका का सुंदर संबंध स्थापित होता है। यह मॉडल “स्वच्छ भारत” की भावना को ज़मीनी स्तर पर सफल रूप में लागू होते हुए दर्शाता है।

छोटे स्थल, बड़ा दृष्टिकोण — पर्यटन से
आर्थिक सशक्तिकरण

इस विज़िट में सबसे महत्वपूर्ण सीख यह रही कि कोई स्थान छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि उसकी प्रस्तुति, प्रबंधन और सुविधाएँ उसे पर्यटन मानचित्र पर पहचान दिलाती हैं। लगभग हर स्थल पर प्रवेश शुल्क लिया जा रहा था, जिससे वहाँ की व्यवस्था, रखरखाव और विकास संभव हो पा रहा है।

पार्किंग अधिकांश स्थलों पर मुख्य द्वार से कुछ दूरी पर बनाई गई थी, जिससे पर्यटक पैदल चलते हुए स्थानीय दुकानों, फूड स्टॉल और छोटे व्यवसायों से जुड़ते हैं। इससे आसपास के लोगों को रोजगार मिलता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था सक्रिय होती है।

परंपरा, आध्यात्म और पर्यटन प्रबंधन का अद्भुत संगम — आदियोगी अनुभव

कोयंबटूर में स्थित आदियोगी परिसर की यात्रा इस एक्सपोज़र विज़िट का एक अत्यंत प्रेरणादायक और सीख देने वाला पड़ाव रहा। यहाँ पहुँचते ही सबसे पहले जो दृश्य मन को आकर्षित करता है, वह है भगवान शिव के “आदियोगी” रूप की विश्वविख्यात भव्य प्रतिमा। लगभग 112 फीट ऊँची यह प्रतिमा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय योग परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान का वैश्विक प्रतीक बन चुकी है।

यह परिसर ईशा फाउंडेशन द्वारा विकसित किया गया है, जहाँ योग, ध्यान, आध्यात्मिक साधना और सांस्कृतिक गतिविधियों का समन्वय देखने को मिलता है। यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत, स्वच्छ और व्यवस्थित है, जिससे यह स्थान केवल एक दर्शन स्थल न होकर “अनुभव स्थल” बन जाता है।

मैने देखा ओर समझा कि प्रतिमा परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार से लगभग 500 मीटर की दूरी तक पर्यटकों को पारंपरिक बैलगाड़ी से ले जाया जाता है। यह व्यवस्था केवल परिवहन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव है। सुंदर सजे-धजे बैल, पारंपरिक शैली की गाड़ी, और प्रति व्यक्ति लिया जाने वाला नाममात्र शुल्क — यह सब मिलकर स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का माध्यम बनते हैं। इससे यह सीख मिलती है कि पुरानी परंपराओं को आधुनिक पर्यटन मॉडल से जोड़कर आकर्षण बढ़ाया जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण — नीलगिरी से मिली बड़ी सीख

नीलगिरी ज़िला की सीमा पर पहुँचते ही प्लास्टिक प्रतिबंध का सख्त पालन देखने को मिला। हमारी बस में रखी प्लास्टिक पानी की बोतलें तक जब्त कर ली गईं। इसका उद्देश्य स्पष्ट था — जंगलों और वन्यजीवों को प्लास्टिक से होने वाले खतरे से बचाना। यह पर्यावरण संरक्षण का अनुकरणीय उदाहरण है।

ऊटी — पर्यटन प्रबंधन का उत्कृष्ट और आत्मनिर्भर मॉडल

ऊटी में प्रवेश करते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ पर्यटन केवल प्राकृतिक सुंदरता के भरोसे नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित प्रबंधन, व्यावसायिक दृष्टिकोण और योजनाबद्ध विकास पर आधारित है। यहाँ हर स्थल को इस प्रकार विकसित किया गया है कि वह पर्यटकों को आकर्षित भी करे और साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाए।

टी गार्डन और चॉकलेट फैक्ट्री — “देखो, समझो, खरीदो” मॉडल

ऊटी के चाय बागानों और चॉकलेट फैक्ट्रियों में पर्यटकों को केवल बाहर से देखने की अनुमति नहीं, बल्कि भीतर जाकर पूरी प्रक्रिया समझने का अवसर दिया जाता है। प्रवेश शुल्क लेकर पर्यटकों को बताया जाता है कि चाय की पत्तियाँ कैसे तोड़ी जाती हैं, किस तरह प्रोसेस होती हैं, ग्रेडिंग कैसे होती है, और अंततः पैकिंग कैसे की जाती है। इसी तरह चॉकलेट निर्माण की प्रक्रिया भी चरणबद्ध तरीके से दिखाई जाती है।

यही नहीं, उसी परिसर में बिक्री काउंटर बनाए गए हैं जहाँ पर्यटक स्वयं देखकर बने उत्पाद तुरंत खरीद सकते हैं। यह “अनुभव आधारित विपणन” का सशक्त उदाहरण है। साथ में फोटोशूट स्पॉट, सुंदर सजावट और कुछ स्थानों पर एडवेंचर गतिविधियाँ भी रखी गई हैं ताकि परिवार, युवा और बच्चे — सभी के लिए आकर्षण बना रहे। इससे एक ही स्थल से कई प्रकार की आय के स्रोत तैयार हो जाते हैं।

बॉटेनिकल गार्डन — प्रकृति संरक्षण और आय का संतुलन

ऊटी का बॉटेनिकल गार्डन केवल घूमने की जगह नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का जीवंत उदाहरण है। यहाँ पौधों को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया गया है। हर प्रजाति का नाम, विवरण और महत्व दर्शाने वाले बोर्ड लगे हैं। बैठने के लिए सुंदर लॉन, साफ-सुथरे मार्ग, फूलों की आकर्षक सजावट — सब कुछ सुव्यवस्थित है।

प्रवेश शुल्क के माध्यम से यहाँ रखरखाव, बागवानी कर्मचारियों का वेतन और संरक्षण कार्य संचालित होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि प्रकृति को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो वह स्वयं आर्थिक संसाधन बन सकती है।

बोट हाउस — साधारण जलाशय से पर्यटन केंद्र

ऊटी का बोट हाउस इस बात का उदाहरण है कि प्राकृतिक संसाधन भले ही साधारण हों, पर यदि प्रस्तुति और प्रबंधन अच्छा हो तो वही स्थान बड़ा पर्यटन केंद्र बन सकता है। यहाँ बोटिंग की सुव्यवस्थित व्यवस्था, टिकट प्रणाली, सुरक्षा उपाय, प्रतीक्षा क्षेत्र, और आसपास छोटे व्यापारिक स्टॉल — यह सब मिलकर इसे आर्थिक रूप से सक्रिय स्थल बनाते हैं।

पाइन फॉरेस्ट — प्रस्तुति की शक्ति

पाइन फॉरेस्ट स्वयं में प्राकृतिक जंगल है, पर इसकी पहचान बढ़ाने के लिए भव्य प्रवेश द्वार, “Pine Forest” नाम का बड़ा बोर्ड, और सेल्फी प्वाइंट बनाए गए हैं। यही छोटे प्रयास इस स्थान को पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना देते हैं। यहाँ से यह सीख मिलती है कि प्राकृतिक स्थल को ब्रांडिंग और प्रस्तुति की आवश्यकता होती है।

पैकारा वॉटरफॉल — सुव्यवस्थित पहुँच का मॉडल

पैकारा वॉटरफॉल में पर्यटकों के लिए बहु-स्तरीय व्यवस्था है। पहले पार्किंग, फिर पैदल मार्ग, फिर ई-रिक्शा सेवा, उसके बाद टिकट काउंटर, और अंत में सीढ़ियों के माध्यम से सुरक्षित पहुँच — यह दर्शाता है कि पर्यटन स्थल केवल प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित पहुँच और सुरक्षा से विकसित होता है।

वन्यजीवन पर्यटन

मुदुमलई टाइगर रिजर्व से गुजरते समय हाथी, चीतल और हिरण देखने का अवसर मिला। यह दर्शाता है कि वन्यजीवन संरक्षण और पर्यटन साथ-साथ चल सकते हैं।

मैसूर — विरासत, आस्था और सुव्यवस्थित पर्यटन का जीवंत उदाहरण

दक्षिण भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर मैसूर पहुँचते ही यह अनुभव हुआ कि यह शहर केवल दर्शनीय स्थलों का समूह नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित पर्यटन प्रबंधन का एक सशक्त मॉडल है। यहाँ परंपरा, धार्मिक आस्था, शाही इतिहास और आधुनिक पर्यटन व्यवस्था का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।

वृंदावन गार्डन — भीड़ ही पहचान बन गई

मैसूर स्थित प्रसिद्ध वृंदावन गार्डन पहुँचते ही सबसे पहले पर्यटकों की भारी भीड़ दिखाई देती है। प्रारंभ में यह लगा कि यह स्थान शायद बहुत असाधारण होगा, पर भीतर जाकर समझ आया कि इसकी विशेषता केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि उसका प्रबंधन और प्रस्तुति है।

पार्किंग स्थल मुख्य प्रवेश द्वार से दूर बनाए गए हैं। इसका सीधा लाभ यह हुआ कि पार्क के बाहर बड़ी संख्या में छोटे व्यवसाय पनप रहे हैं — खिलौनों की दुकानें, फूड स्टॉल, स्थानीय उत्पादों की बिक्री। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है।

गार्डन के भीतर सुव्यवस्थित पथ, हरी-भरी घास, आकर्षक फव्वारे और शाम को होने वाला म्यूजिकल फाउंटेन शो पर्यटकों को लंबे समय तक रुकने के लिए प्रेरित करता है। हजारों की संख्या में लोग केवल इस शो को देखने के लिए आते हैं। यहाँ से यह सीख मिलती है कि आकर्षण प्लस भीड़ = लोकप्रियता, और लोकप्रियता से पर्यटन की पहचान बनती है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण तुलना भी सामने आई — छत्तीसगढ़ के नया रायपुर में मंत्रालय के समीप भी सुंदर म्यूजिकल फाउंटेन शो होता है, परंतु निःशुल्क होने के कारण लोगों का ध्यान उतना आकर्षित नहीं हो पाता। इससे यह समझ आता है कि नाममात्र शुल्क भी लोगों में उत्सुकता और महत्व का भाव उत्पन्न करता है।

आस्था का केंद्र — चामुंडेश्वरी मंदिर

मैसूर यात्रा के दौरान माँ चामुंडेश्वरी के पवित्र मंदिर में दर्शन का अवसर मिला। यह अनुभव आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देने वाला रहा। पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर धार्मिक पर्यटन का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था और अनुशासित व्यवस्था दर्शाती है कि धार्मिक स्थल भी पर्यटन का महत्वपूर्ण अंग बन सकते हैं, यदि वहाँ स्वच्छता, सुविधा और प्रबंधन हो।

मैसूर पैलेस — विरासत संरक्षण का आदर्श

मैसूर का भव्य राजमहल, मैसूर पैलेस, इस यात्रा का सबसे प्रभावशाली पड़ाव रहा। महल की भव्य वास्तुकला, नक्काशीदार स्तंभ, सुसज्जित दरबार हॉल, रंगीन कांच, और ऐतिहासिक कलाकृतियाँ यह दर्शाती हैं कि विरासत को सहेजकर भी पर्यटन से जोड़ा जा सकता है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इतने विशाल और प्राचीन महल का रखरखाव अत्यंत उत्कृष्ट है। स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा और मार्गदर्शन व्यवस्था
— सब कुछ व्यवस्थित है। यहाँ आने वाला पर्यटक केवल भवन नहीं देखता, बल्कि इतिहास का अनुभव करता है।

आस्था, प्रयास और विनम्रता का संगम — बेंगलुरु से तिरुपति तक

मैसूर से आगे बढ़ते हुए हमारा दल बेंगलुरु पहुँचा। यहीं यात्रा के दौरान एक विशेष इच्छा ने आकार लिया — तिरुपति बालाजी मंदिर में दर्शन करने की। यह स्थल मूल कार्यक्रम में शामिल नहीं था, परंतु सभी साथियों की गहरी श्रद्धा और उत्साह को देखते हुए इस दिशा में प्रयास प्रारंभ हुए।

हमारे माननीय मुख्यमंत्री विष्णु देव सायं जी ने वह साथ ही राज्य केंद्र मंत्री तोखन साहू और साथ ही छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ रमन सिंह ने दर्शन हेतु अनुशंसा पत्र भेजे गए — यह हमारे लिए सौभाग्य और सहयोग की भावना का प्रतीक था। संबंधित प्राधिकरण को पत्र प्रेषित किए गए, ताकि समयाभाव के बावजूद दर्शन की संभावना बन सके। इस पूरे प्रयास में जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों ने समन्वय और अनुमति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके लिए हम हृदय से आभारी हैं। यात्रा प्रबंधन से जुड़े सदगुरु ट्रेवल्स ने भी कार्यक्रम में आवश्यक लचीलापन दिखाते हुए इस आध्यात्मिक पड़ाव को संभव बनाने में सहयोग दिया।

बेंगलुरु पहुँचकर अल्प विश्राम और भोजन के बाद हम रात लगभग 11 बजे तिरुपति के लिए रवाना हुए। मार्ग लंबा था, लेकिन मन में उत्साह और श्रद्धा उससे कहीं अधिक। यात्रा के दौरान यह जानकारी मिली कि अनुशंसा पत्र के आधार पर दर्शन की औपचारिक प्रक्रिया एक दिन पूर्व पूरी करनी होती है, जो समय की कमी के कारण हमारे लिए संभव नहीं हो पा रही थी।

ऐसी स्थिति में भी किसी के मन में निराशा नहीं थी। सभी ने एकमत होकर निर्णय लिया कि सामान्य श्रद्धालुओं की तरह पंक्ति में लगकर दर्शन करेंगे—चाहे प्रतीक्षा कितनी भी लंबी क्यों न हो। यही सामूहिक श्रद्धा इस यात्रा की सबसे बड़ी शक्ति बनी।

तिरुमला पहुँचकर हम नियमित कतार में शामिल हुए। जहाँ सामान्यतः 10–12 घंटे का समय लग जाता है, वहीं हमें लगभग 3–4 घंटे में दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह अनुभव केवल दर्शन नहीं, बल्कि विश्वास, धैर्य और ईश-कृपा का साक्षात अनुभव था।

वापस वाहन तक पहुँचने पर चालक ने भी आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने कम समय में दर्शन होना विरल है। इस प्रसंग ने हम सभी के मन में यह विश्वास और दृढ़ किया कि सच्ची श्रद्धा मार्ग प्रशस्त कर देती है—विशेष व्यवस्थाएँ सहायक हो सकती हैं, पर अंततः आस्था ही प्रधान है।

यह आध्यात्मिक पड़ाव हमारी यात्रा का अत्यंत भावपूर्ण और स्मरणीय अध्याय बन गया, जहाँ प्रयास, सहयोग और विनम्रता—तीनों का सुंदर संगम देखने को मिला।

अध्ययन यात्रा का अंतिम दिन — बेंगलुरु विधानसभा का अवलोकन
दक्षिण भारत एक्सपोज़र विज़िट का अंतिम दिन भी सीख और अवलोकन से भरपूर रहा। उसी शाम हमारी वापसी उड़ान रायपुर के लिए निर्धारित थी, किंतु समय का सदुपयोग करते हुए हमने दिन को व्यर्थ न जाने देने का निर्णय लिया। इसी क्रम में हम कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु स्थित भव्य विधानसभा भवन के अवलोकन हेतु पहुँचे।

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