जब मिलता था पत्नी का लाइसेंस!



अर्जुन झा-
जगदलपुर एक दौर था, जब रेडियो और साइकिल खरीदने पर लाइसेंस की जरूरत पड़ती थी, लेकिन क्या आपको मालूम है कि पत्नी के लिए भी लाइसेंस बनवाना पड़ता था और दूसरी पत्नी रखने पर अलग से लाइसेंस की जरूरत होती थी? जी हां ऐसा ही होता था ब्रिटिश हुकूमत में। एक ऐसा ही लाइसेंस हमारे हाथ लगा है, जो अंग्रज सरकार के काले सच को उजागर करता है।
अंग्रेजों ने हमारे पूर्वजों पर न सिर्फ जमकर जुल्म ढाये थे, बल्कि तरह तरह के शुल्क लगा कर उनसे जमकर धन की उगाही भी करते रहे। ब्रिटिश हुकूमत में बने कई कानून आजाद भारत में भी कुछ वर्षों तक बदस्तूर जारी रहे। इनमें रेडियो और साइकल के लाइसेंस और पैदल चलने तक के लिए लाइसेंस की जरूरत पड़ती थी। इनका शुल्क महज 10 और 20 पैसे हुआ करता था, मगर उस दौर में यही लोगों पर बहुत भारी पड़ता था, क्योंकि उस समय इनकम सोर्स बहुत कम थे। अब आपको जो जानकारी दे रहे हैं, उसे सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। अंग्रेज शासन काल में पत्नी लाइसेंस विभाग भी हुआ करता था और इस विभाग का अधिकारी मुख्य निरीक्षक हुआ करता था, जो पत्नी के लिए लाइसेंस जारी करता था। पत्नी वंश वृद्धि, गृहस्थ जीवन और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए रखी जाती थी, एक बार में एक ही पत्नी के लिए लाइसेंस जारी किया जाता था। दूसरी पत्नी रखने के लिए अलग से लाइसेंस लेना पड़ता था। लाइसेंस की अवधि 10 वर्ष की होती थी और इसके बाद लाइसेंस नवीनीकरण कराना पड़ता था। लाइसेंस केवल गृहस्थ पुरुषों को जारी किया जाता था। असत्य जानकारी देने पर लाइसेंस रद्द कर दिया जाता था। ऐसा ही एक दुर्लभ लाइसेंस हमें मिला है, जो चौक बाजार बनारस के अनाज एवं वस्त्र व्यापारी लाला घनश्याम दास पिता सेठ मुरारी लाल के नाम पर जारी हुआ था। 17 फाल्गुन संवत 1959 यानि सन 1902 ईस्वी को जारी हुआ था।

शुल्क और लाइसेंस की शर्तें
लाइसेंस का शुल्क 1 रुपया, पंजीकरण शुल्क आठ आना और दस्तावेज शुल्क चार आना समेत कुल दो रुपए अदा करना पड़ते थे। शर्तों के अनुसार एक समय में केवल एक पत्नी रखना विधि सम्मत माना जाता था। पत्नी के साथ सदव्यवहार करना, उसकी सुरक्षा, भरण पोषण, वस्त्र, आवास का इंतजाम करना लाइसेंसी की जिम्मेदारी होती थी। पत्नी को कष्ट देना, त्यागना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता था।. दूसरी पत्नी के लिए अलग से लाइसेंस बनवाना जरूरी था।

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