आदिवासी बच्चों का भोजन पर डाका, शासन के निर्देश दरकिनार



-अर्जुन झा-
जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में शिक्षा के नाम पर संचालित आवासीय विद्यालयों को भ्रष्टाचार का अड्डा बना लिया गया है। आदिम जाति कल्याण विभाग, शिक्षा विभाग और समग्र शिक्षा के अंतर्गत संचालित इन संस्थाओं में बच्चों के पोषण आहार उपलब्ध कराने के नाम पर एक ऐसा सिंडिकेट सक्रिय है, जो न केवल शासन के खजाने को खोखला कर रहा है, बल्कि आदिवासी बच्चों की स्कॉलरशिप पर भी डाका डाल रहा है।
भारत सरकार ने सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने और बिचौलियों का एकाधिकार खत्म करने के लिए जेम पोर्टल के जरिए सामग्री आपूर्ति को अनिवार्य कर दिया है। यह नियम छत्तीसगढ़ में भी लागू है।नवोदय या एकलव्य विद्यालयों में जेम पोर्टल के माध्यम से होने वाली पारदर्शी खरीद और जिले के अन्य आवासीय विद्यालयों में चल रही सेटिंग के बीच का अंतर जमीन- आसमान का है। सूत्रों की मानें तो दोनों संस्थाओं की खरीदी बाजार भाव से 40 से 50 प्रतिशत अधिक दर पर सामग्री राज्य की शैक्षिक आवासीय विद्यालयों द्वारा सीधे दुकानदारों से की जा रही है। यह महज खरीद नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रष्टाचार है, जहां प्रतिस्पर्धा की कोई जगह नहीं है।

अधीक्षक सिर्फ रबर स्टांप
इस पूरे गोरखधंधे की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि संस्थाओं के अधीक्षक और अधीक्षिकाएं महज रबर स्टांप बनकर रह गए हैं। उनके कंधों पर बंदूक रखकर पीछे से कोई और ही खेल खेल रहे हैं। अधीक्षक अधीक्षकाओं में तो विरोध करने की हिम्मत तक नहीं है। उन्हें आम को इमली बोला जाता है तो वो इमली ही बोलते हैं, क्योंकि अगर उन्होंने विरोध किया तो उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाने का भय भी तो है। जिससे चलते चुप रहना ही उनकी मजबूरी है।आखिर यह डर किसका है? और कौन है वह अदृश्य ताकतें जो इन निरीह बच्चों के भोजन को कमाई का जरिया बनाए हुए है? दंतेवाड़ा जिले की विभिन्न संस्थाओं के अलावा अगर हम एजुकेशन सिटी की ही बात करें तो अकेले
एजुकेशन सिटी में निवासरत आवासीय बच्चों से ही लगभग 50 लाख की मासिक लूट सेटिंग ओर फिटिंग में नियमों को ताक पर रखकर होने की बात कही जा रही है। जहां सीधे दुकानदार से खरीदी हो रही है। गीदम स्थित ‘आस्था’ जैसी संस्था में 1200 से अधिक बच्चे आवासीय विद्यालय में रहे हैं। अकेले एजुकेशन सिटी में ही लगभग 5,000 विद्यार्थियों के पोषण आहार पर हर महीने शासन के खजाने से लगभग 50 लाख रुपये से अधिक खर्च होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि इन करोड़ों के बजट पर भंडारण अधिनियम के नियमों को ताक पर रख दिया गया है। जेम पोर्टल की शर्तों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आदिवासी बच्चों को मिलने वाली 1500 से 2000 रुपए की मासिक स्कॉलरशिप की राशि को ये माफिया खुलेआम निगल रहे हैं। इसके बाद भी प्राइवेट कंपनी द्वारा ऑडिट फाइलों में ‘सब चंगा’ का रहस्य आश्चर्यजनक है।
सबसे बड़ा सवाल उस ऑडिट सिस्टम पर है, जो इन अनियमितताओं को देख ही नहीं पाता। आखिर इस खुली लूट और नियम विरुद्ध खरीदी पर विभागीय प्रमुखों को इस लूट पर कोई आपत्ति क्यों नहीं है? ऑडिट की फाइलों में यह ‘काला धन’ सफेद कैसे हो जाता है? यह सीधे तौर पर शासन की आंखों में धूल झोंककर बच्चों के भविष्य और उनके हक की राशि पर डाका डालने का मामला है।

शासन के लिए चेतावनी
यह ‘पोषण माफिया’ आदिवासी बच्चों के निवाले को कमीशन के तराजू पर तौल रहा है। शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यह कोताही केवल उन विभाग की प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मिलीभगत का प्रमाण है। क्षेत्र के जागरूक नागरिकों की मांग है कि इस पूरे मामले में जिला प्रशासन
उच्च स्तरीय जांच करे तथा एजुकेशन सिटी सहित जिले के सभी शिक्षा विभाग, समग्र शिक्षा और अजजा कल्याण विभाग के आवासीय संस्थाओं में पोषण आहार खरीदी की उच्च स्तरीय जांच हो।
भ्रष्टाचार पर नकेल कसते हुए बच्चों के निवाले पर खुली लूट मचाने वाले सफेदपोशों और उनके सरपरस्त अधिकारियों को बेनकाब किया जाए। वही पूरे सिस्टम में पारदर्शी व्यवस्था दिखाई दे तथा जेम पोर्टल के माध्यम से, प्रतिस्पर्धात्मक दरों पर और भंडारण नियमों के दायरे में ही खरीदी अनिवार्य की जाए, ताकि बच्चों को न केवल बेहतर पोषण मिल सके, बल्कि शासन के लाखों रुपयों की भी बचत हो। अगर समय रहते इन रसूखदार पोषण माफियाओं पर लगाम नहीं कसी गई, तो यह आदिवासी बच्चों के भविष्य के साथ किया गया अक्षम्य अपराध होगा। शासन को अब निर्णय लेना होग की वह इन बच्चों के साथ खड़ा है या उन माफियाओं के साथ जो उनकी थाली छीनकर अपनी जेबें भर रहे है।

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