700 वर्षों से चली आ रही है कठोर साधना की यह परंपरा
–अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर की धरती रहस्यमयी अनबूझ पहेलियों और आस्था में अनूठे रंगों से भरी हुई है।इसी क्रम में अध्यात्म, आस्था और ऐतिहासिक धरोहरों की पावन नगरी बड़े डोंगर में शारदीय नवरात्रि पर्व का शुभारंभ पारंपरिक हर्षोल्लास और भक्तिमय माहौल में हुआ। पर्व के प्रथम दिन बस्तर अंचल की अत्यंत दुर्लभ, रहस्यमयी और अलौकिक मानी जाने वाली ‘जोगी बिठाई’ रस्म विधिवत संपन्न की गई। 14वीं शताब्दी से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन करते हुए कन्हार गांव के मंशाराम मांझी का परिवार आज भी पूरी निष्ठा से माता के आदेश का पालन कर रहा है। नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि की संध्या को दंतेश्वरी माई मंदिर परिसर में पारंपरिक वाद्ययंत्रों मोहरी, तोड़ी और ढोल की गूंज के बीच रस्म अदायगी शुरू हुई। पुजारियों, मांझी- चालकियों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी में माता की विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने बने ‘जोगी बिठाई भवन’ में जोगी को पूरे विधि-विधान से आसनस्थ कराया गया।बस्तर के लोकविश्वास के अनुसार, जोगी बिठाई केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि समूचे क्षेत्र की सुख, शांति, समृद्धि और दैवीय विपदाओं से रक्षा के लिए की जाने वाली एक कठोर तपस्या है। जोगी बने साधक अगले नौ दिनों तक उसी भवन में एक गड्ढे (साधना स्थल) के भीतर बैठकर निर्जला उपवास रखेंगे। इस दौरान वे अन्न, फल और जल तक ग्रहण नहीं करते और अखंड ज्योति के समक्ष मौन रहकर माता की निरंतर आराधना में लीन रहते हैं। रियासतकालीन इतिहास के अनुसार, बस्तर के काकतीय राजवंश और कुलदेवी मां दंतेश्वरी के प्रति अटूट आस्था की यह रस्म करीब 700 वर्षों से अनवरत जारी है। कन्हार गांव के मंशाराम मांझी के पूर्वजों को माता ने इस तपस्या का दायित्व सौंपा था, जिसे यह परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूरे त्याग और समर्पण के साथ निभाता आ रहा है।
अष्टमी को बोनालूट, नवमी को जोगी उठाई
नौ दिनों के इस महातप का समापन अत्यंत विधि-विधान से होगा।महाअष्टमी की रात्रि विशेष तांत्रिक व वैदिक विधानों के साथ ‘बोनालूट’ रस्म निभाई जाएगी, जिसमें माता को विशेष भोग अर्पित कर क्षेत्र के कल्याण की प्रार्थना की जाएगी। महानवमी की पावन बेला पर जोगी को मंत्रोच्चार और पूजा-अर्चना के साथ आसन से उठाया जाएगा। इसके बाद उन्हें जल व प्रसाद ग्रहण कराकर उनका कठिन व्रत पूर्ण कराया जाएगा।
बस्तर दशहरा प्रस्थान
जोगी उठाई के तत्काल बाद माता की छत्र व डोली को पूरे राजकीय व पारंपरिक सम्मान के साथ विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में सहभागिता के लिए जगदलपुर रवाना किया जाएगा। नवरात्रि के अवसर पर मंदिर प्रांगण को दीपों और फूलों से सजाया गया है। बड़े डोंगर सहित आसपास के वनांचल क्षेत्रों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन और इस अनूठी रस्म के साक्षी बनने पहुंच रहे हैं।
