अपनी जान ही नहीं, प्रकृति के भी दुश्मन हैं सुरा प्रेमी



शराब पीकर बोतलें, पाउच को फेंक देते हैं जहां -तहां

जगदलपुर (अर्जुन झा ):- शराब पीने वाले लोग अपनी जान के दुश्मन तो होते ही हैं, अब वे प्रकृति और पर्यावरण के भी दुश्मन बन गए हैं। शराब पीने के बाद जहां -तहां फेंक दी जाने वाली बोतलों, पाउच और डिस्पोजल गिलास से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

अगर कोई कहे कि शराबी पर्यावरण के भी दुश्मन होते हैं, तो यकबयक आप यकीन नहीं करेंगे। मगर यह बात उसी तरह सौ फीसद सच है, जैसा कि सूरज पूर्व दिशा से प्रकट होता है। सूरज और शराबियों में फर्क यह है कि सूरज उजाला बिखेरता है तथा प्रकृति और पर्यावरण का पोषण करता है। इसके उलट शराबी व्यक्ति अपनी जान खतरे में डाल देता है और अपने परिवार के वर्तमान एवं भविष्य को अंधकारमय बना डालता है। अब तो शराबी अपनी जान के साथ साथ प्रकृति और पर्यावरण के भी दुश्मन बन बैठे हैं। समूचे बस्तर संभाग में इन दिनों जो हालात देखने में आ रहे हैं, वे प्रकृति की विनाश लीला की ओर इंगित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सरकार बदलते ही शराबियों की गतिविधियों में भी बदलाव आ गया है। जुआ, सट्टा और शराबखोरी को अनैतिक कृत्य माना जाता है। व्यक्ति चाहे कितना बड़ा भी जुआरी, सटोरिया व शराबी क्यों न हो, वह इन कृत्यों को समाज की नजरों से बचकर ही अंजाम देता है, अपनी शौक पूरी करने के लिए वह पर्दा जरूर करता है। राज्य में जब कांग्रेस की सरकार थी, तब सभी शराब दुकानों का शासकीयकरण कर दिया गया। शराब दुकानों के आसपास अहाते चलाने के लिए सुविधा दी गई थी। सरकार क्या बदली, शराबियों के बुरे दिन आ गए। भाजपा सरकार ने अहातों को बंद करवा दिया है। इसके चलते शराबप्रेमियों को बड़ी असुविधा हो रही है। शराब पीने के लिए उन्हें सुरक्षित ठौर तलाशने के वास्ते यहां वहां भटकना पड़ रहा है। कुछ लोग तो दुकानों से शराब खरीदते ही वहीं किसी कोने में जाकर शराब गटक लेते हैं। ऐसे जल्दबाज शराबी पूरी व्यवस्था के साथ शराब दुकान में पहुंचते हैं। जल्दी में रहने वाले ऐसे शराबी डिस्पोजल गिलास, चखना और पानी की बोतल लेकर जाते हैं। शराब दुकान के पास किसी कोने में खड़े होकर वे अपनी शौक पूरी कर लेते हैं और फिर शराब की बोतल, डिस्पोजल गिलास व पानी की बोतल को आसपास फेंककर रफूचक्कर हो जाते हैं। वहीं जो शौकीन लोग पूरसुकून अंदाज में पीने वाले होते हैं और जिन्हें अपनी इज्जत का थोड़ा बहुत डर रहता है, वे आसपास स्थित जंगल झाड़ियों में महफिल सजाना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे ‘इज्जतदार’ शराबी भी उन्हीं साजो सामान लेकर जंगलों और झाड़ियों की शरण लेते हैं, जिस तरह के सामान लेकर जल्दबाज शराबी पहुंचते हैं। मगर उन्हीं जल्दबाज और थोड़ी कम शर्मो हया वाले शराबियों की तरह ही ऐसे ‘इज्जतदार’ शराबी भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में बराबर का योगदान देते हैं।अहाते बंद हुए, तो मदिराप्रेमी अब जंगल झाड़ियों का सहारा लेने लगे हैं। शराब पीने वाले लोग डिस्पोजल गिलासों, कांच व प्लास्टिक की बोतलों और पाउच को जहां -तहां फेंककर पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने एक तरफ शराब की दुकान को सरकारी तो कर दिया और शराब प्रेमियों के पीने की सुविधा के लिए अहाता का निर्माण भी कराया था, परंतु वर्तमान में अहाता का संचालन बंद है। जिससे मदिरापान करने के लिए लोगों को शराब दुकान के आसपास जंगलो एवं रोड पर बैठने पर मजबूर होना पड़ रहा है। शराब पीने के बाद भाई लोग शराब एवं पानी की खाली बोतलें और डिस्पोजल गिलास को वहीं पर छोड़ देते हैं। इन कांच और पलास्टिक की बोतलों और ट्रेटा पैक पाउचों कि वजह से पर्यावरण को क्षति पहुंच रही है। यह चीजें लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह हैं। एक ओर तो सरकार पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित रहने का दम भरती है, तो वहीं दूसरी तरफ इस तरह के कृत्यों को प्रोत्साहित कर पर्यावरण की लुटिया ही डुबो रही है। शासन प्रशासन अगर शराब दुकान के पास बने इन अहातों को पुनः शुरू करवा देते हैं, तो इससे बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा ही, साथ ही आसपास की सफाई में इजाफा होगा और पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचेगा। यह विडंबना ही है कि सबसे ज्यादा राजस्व देने वाली शराब दुकानों का ही तिरस्कार किया जा रहा है।

अहाते से मिलेगा रोजगार
अब देखना होगा कि जो पुरानी सरकार नहीं कर पाई उसे नई सरकार कर पाती है या नहीं? लोगों का कहना है कि शराब दुकानों के आसपास चखना सेंटर और अहाते चलाने की अनुमति बेरोजगार युवाओं को दी जानी चाहिए। इसके एवज में सरकार चाहे तो शुल्क भी ले सकती है। इससे शासन के राजस्व में वृद्धि ही होगी।

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