ओड़िशा के वड्डे ने ठहराया मौतों का जिम्मेदार, तो मार डाले गए इतकल गांव के वड्डे परिवार के पांच लोग*l

अर्जुन झा-

जगदलपुर। झाड़ फूंक और तंत्र मंत्र की गहरी पैठ आज भी बस्तर संभाग के गांवों में बनी हुई है। संभाग के सुकमा जिले में दो दिन पहले दिल दहलाने वाली जो घटना हुई है, उसके पीछे भी यही कारण रहा है। सुकमा के कोंटा विकासखंड की ग्राम पंचायत मुरलीगुड़ा के इतकल गांव में रविवार को एक ही परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के मामले में जितना अंधविश्वास जिम्मेदार है, उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदार जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग हैं। मृतक परिवार का एक सदस्य वड्डे का काम करता था। वड्डे झाड़ फूंक से उपचार करने वाले को कहते हैं। इतकल गांव के लोग बीमार पड़ने पर इसी वड्डे के पास झाड़ फूंक कराने जाया करते थे। उसकी झाड़ फूंक के बाद भी जब बीमारी दूर नहीं हुई और मौतों का क्रम जारी रहा, तो कुछ ग्रामीणों ने पड़ोसी राज्य ओड़िशा के एक गांव में जाकर वहां के वड्डे से संपर्क किया तो उस वड्डे ने मौतों के लिए इतकल के वड्डे को जिम्मेदार ठहरा दिया। इसके बाद गांव लौटकर ग्रामीणों ने आम बैठक बुलाई और गांव के वड्डे परिवार की हत्या की योजना बना ली गई। इस निर्मम हत्याकांड के लिए हमारा सिस्टम भी पूरी तरह जवाबदेह है।

इतकल गांव में पिछले चार वर्ष में 30 पुरुषों और पिछले 18 माह में 14 मासूम बच्चों की मृत्यु हुई है। इतनी बड़ी संख्या में गांव में होने वाली मौतों से गांव के लोग हताश- परेशान थे और गांव में ही झाड़-फूंक कर अपनी समस्या का उपचार ढूंढते रहे। इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। आखिरकार गांव में हो रही लगातार मृत्यु से उपजी ग्रामीणों की हताशा ने इस जघन्य हत्याकांड को जन्म दे दिया। ग्रामीणों ने बताया कि गांव में लगातार लोगों के मरने से गांव वाले परेशान थे। वे सभी अपना उपचार गांव के ही झाड़–फूंक करने वाले वड्डे से करवाते थे। इसके बाद भी गांव मौत का सिलसिला थम नहीं रहा था। दस दिन पहले इस गांव के कुछ लोग ओडिशा के एक वड्डे के पास इस परेशानी का उपाय ढूंढने गए थे। उस वड्डे ने ग्रामीणों को झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र करने के बाद बताया कि गांव में लगातार हो रही मृत्यु के पीछे तुम्हारे गांव का ही वड्डे जिम्मेदार है। इस बात ने हताश-परेशान ग्रामीणों के बीच चिंगारी भड़काने का काम किया। गांव के लोग भड़क उठे और एक सप्ताह पूर्व ही वड्डे के परिवार को गांव से बहिष्कृत कर दिया गया। इस बीच जब फिर से मंगलवार आने वाला था तो ग्रामीणों में गांव में हो रही मृत्यु को रोकने के लिए रविवार को वड्डे परिवार को बुलाकर बैठक की। इस बैठक में एक आपराधिक निर्णय लेते हुए वड्डे परिवार को मृत्युदंड की सजा सुना दी गई। ग्रामीणों ने लाठी-डंडों से पीटकर परिवार के पांच सदस्यों को बेरहमी से मार डाला।

एक घर से उठती थीं कई आर्थियां
ग्रामीणों ने बताया कि चार साल के भीतर इतकल गांव में 30 लोग मृत्यु का ग्रास बन गए। एक ही घर से 3-4 लाशें उठने के बाद कुछ दिन तक मृत्यु का दौर रुक जरूर जाता था, लेकिन कुछ अरसा गुजरने के बाद फिर किसी न किसी की मौत हो जाती थी। गांव के सलवम परिवार के लोगों की ज्यादातर मौत हुईं है। सलवम जोगा, सलवम सुब्बा, सलवम रामा और सलवम लच्छी एक ही घर के थे, जिनकी मृत्यु अज्ञात कारणों से हुई। वहीं सलवम कन्ना, सलवम रत्तो और सलवम लच्छा एक ही घर के थे। मौसम रामा, मौसम सिंगा एक घर के थे, सलवम सुब्बा, कुंजा वीरा जैसे दर्जनों लोगों की मौत बिना किसी करण के हुई है। वहीं पोडियम सिलको ने बताया उनके घर के तीन बच्चे पोडियम रियांसी 2 महीने की थी, पोडियम सीको 6 महीने और पोडियम संतोष के 2 महीने के बेटे की भी किसी वजह से मौत हो गईहै।

गांव में महिला आबादी ज्यादा
लगातार कई लोगों की मौत के बाद अब गांव में 30 महिलाएं विधवा हो चुकी हैं। गांव में युवा पीढ़ी भी कम है। जब हमने पड़ताल की तो प
पाया कि गांव में 63 प्रतिशत महिलाएं हैं। गांव की खेती से लेकर गाय चराने और महुआ बीनने से लेकर बाजार जाने तक का काम महिलाएं ही करती हैं। गांव में दोरला आदिवासी जनजाति के लोग निवासरत हैं।

हर मंगलवार को मौत..!
पिछले तीन सप्ताह तक गांव में शोक का माहौल था। तीनों हफ्ते मगलवार के दिन ही लोगों की मौत की भी अजब कहानी सामने आई है। पहले मंगलवार को सलवम मुत्ता की शरीर दर्द के चलते मौत हों गई। उसके बाद वाले मंगलवार को पांडरूम नरैया की मौत पैर और घुटने दर्द के चलते हुई। उसके बाद के मंगलवार को कुंजाम मुकेश की 3 महिने की बेटी की मौत अज्ञात कारणों से हो गई। जिसके बाद आने वाले मंगलवार से पहले इतवार को ही गांव के लोगों ने शक और अंधविश्वास के चलते एक परिवार के पांच लोगों की हत्या कर दी। लेकिन महिने भर में हुई तीन मौतों के बाद भी स्वास्थ विभाग के कर्मियों ने इतकल गांव की ओर रुख नहीं किया। जबकि गांव से महज 4 किलोमीटर दूर ही बंढा गांव में अस्पताल है, जहां नर्स और डॉक्टर तैनात हैं।

जेनेटिकल प्रॉब्लम संभव
पड़ताल में एक बड़ी बात समाने आई है कि दोरला जनजाति में पारिवार के भीतर ही विवाह करने का चलन है। यानि परिवार के भीतर से ही वर वधु का चयन होता है और शादी कर दी जाती है। इससे वैज्ञानिक तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि गांव में हो रही बच्चों की मौतों के पीछे जेनेटिकल प्रॉब्लम कारक हो सकती है।
गांव के लोगों ने पारिवारिक विवाह की बात बताई। गांव में ज्यादातर युवकों की शादी उनके रिश्तेदार यानि बहन की बेटी, मामा की बेटी और परिवार के अन्य सदस्यों से हुई है। इसके मद्देनजर गांव में स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दों पर प्राइमरी हेल्थ केयर सेवा प्रदाताओं को उचित शिक्षा और प्रशिक्षण देकर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, ताकि ग्रामीणों में अमूमन होने वाली सिज़ोफ्रेनिया, सिकालिन, निमोनिया जैसी बीमारियों से उन्हें बचा जा सके।

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