सुशासन तिहार में शिक्षा व्यवस्था बेनकाब, खैरगुड़ा के बच्चों का भविष्य अधूरी छत के नीचे दफ्न
-अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर जिले में जहां एक ओर पूरा प्रशासनिक अमला सुशासन तिहार के जरिए सरकार की योजनाओं का बखान कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जिले के खैरगुड़ा से आई एक तस्वीर ने सुशासन के सारे दावों की पोल खोल कर रख दी है। ग्राम पंचायत कुंडगुड़ा मधोता-2 का प्राथमिक शाला भवन इस बात का जीता-जागता सबूत बन गया है कि कागजों पर दौड़ने वाली विकास की गाड़ी जमीन पर कैसे दम तोड़ देती है। जिला खनिज न्यास निधि मद के लाखों रुपये इस स्कूल भवन के लिए स्वीकृत हुए थे, ताकि खनिज प्रभावित क्षेत्र के बच्चों को पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल मिल सके। लेकिन आज सालों बीत जाने के बाद भी यहां सिर्फ आधी-अधूरी दीवारें खड़ी हैं। छत का नामोनिशान नहीं है और जो सरिया कभी मजबूत भविष्य की नींव बनने वाला था, वह अब बारिश और धूप में जंग खाकर टूटने के कगार पर है। भवन के चारों तरफ उग आए झाड़-झंखाड़ खुद गवाही दे रहे हैं कि यहां निर्माण कार्य महीनों से नहीं, बल्कि शायद साल भर से ठप पड़ा है।
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि अब जबकि 16 जून से नया शिक्षा सत्र शुरू होने में महज 30 दिन बचे हैं, तब 60 से अधिक मासूम बच्चों के स्वागत के लिए फिर वही एक जर्जर कमरा खड़ा है। उसी एक कमरे में पांचों कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठेंगे, एक ही ब्लैकबोर्ड पर पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई होगी। शोर में न कोई सुन पाएगा, न कोई समझा पाएगा। शिक्षा का अधिकार कानून साफ कहता है कि हर बच्चे को उचित भवन, शिक्षक और माहौल मिलना उसका मौलिक अधिकार है, मगर खैरगुड़ा में इस कानून का हर अक्षर उसी कमरे की तरह रोज दरक रहा है। जब बुनियाद ही नहीं होगी तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की इमारत कैसे खड़ी होगी। ये बच्चे किस अपराध की सजा भुगत रहे हैं कि सरकार के पास भवन बनाने के लिए डीएमएफ का पैसा तो है, कार्य एजेंसी के रूप में ग्राम पंचायत भी तय है, लेकिन स्कूल उद्घाटन लायक भी नहीं बन पाया है। सवाल यह भी है कि स्वीकृत सारी रकम आखिर कहां गई, किसकी जेब की थाती बन गई? इस पूरी बदहाली पर प्रशासनिक रवैया और भी चौंकाने वाला है। जब इस बदहाल भवन की वस्तुस्थिति जानने के लिए कुंडगुड़ा के सरपंच से संपर्क साधने की कोशिश की गई तो कॉल अनुत्तरित रही। ग्राम पंचायत सचिव ने भी फोन उठाना जरूरी नहीं समझा। शिक्षा विभाग का पक्ष जानने के लिए जब बस्तर के विकासखंड शिक्षा अधिकारी को फोन लगाया गया तो वहां से भी कोई जवाब नहीं आया। सवाल यह है कि जब कार्य एजेंसी और शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारी ही जनता और मीडिया के सवालों से बच रहे हैं, तो फिर सुशासन तिहार मनाने का औचित्य क्या है?सुशासन का पहला सिद्धांत ही जवाबदेही है, और यहां जवाब देने वाला ही गायब है।
शाबास मंडावी गुरुजी
इस अंधेरे के बीच उम्मीद की एकमात्र किरण प्रधान अध्यापक छन्नू राम मंडावी और गांव का समुदाय है। संसाधनों के अभाव के बावजूद छन्नूराम मंडावी के अथक प्रयासों से इस स्कूल के बच्चे हर साल जवाहर नवोदय विद्यालय और एकलव्य आवासीय विद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में चयनित हो रहे हैं। स्कूल परिसर में पोषण वाटिका लहलहा रही है, बच्चों के लिए खुद का पुस्तकालय भी चलाया जा रहा है। गांव के लोग खुद श्रमदान करके स्कूल को किसी तरह चला रहे हैं। सोचिए, अगर इन बच्चों को एक अदद छत और चार दीवारें मिल जाएं तो ये कहां से कहां पहुंच जाएंगे। यहां कमी हौसले की नहीं है, कमी सिस्टम की नीयत की है। डीएमएफ का पैसा खनिज से प्रभावित इन बच्चों के भविष्य के लिए ही है। अब देखना यह है कि सुशासन तिहार की भीड़ में क्या किसी की नजर खैरगुड़ा के इन बच्चों पर पड़ती है या फिर अगले सत्र में भी ये मासूम उसी एक कमरे के छत के नीचे अपने भविष्य के ताने बाने बुनते रहेंगे?
ठीक कर लेंगे व्यवस्था
शाला भवन निर्माण करा रहे ठेकेदार की लापरवाही सामने आई है, लेकिन आगामी शिक्षा सत्र शुरू से पूर्व ही व्यवस्था ठीक करा ली जाएगी।
–बीआर बघेल,
जिला शिक्षा अधिकारी बस्तर
