कवर्धा स्थित माँ राजराजेश्वरी की महिमा अपरम्पार – आदित्य कुमार
कवर्धा :- श्रीराजराजेश्वरी कालीमन्दिर कवर्धा
“या मूलप्रकृति:शुद्धा जगदम्बा सनातनी।
सैव साक्षात्परं ब्रह्म सास्माकं देवतापि च।।”
अर्थात जो शुद्ध,शाश्वत और मूलप्रकृतिस्वरूपिणी जगदम्बा हैं,वे ही साक्षात परब्रह्म हैं और वे ही हमारी देवता भी हैं।
धर्म नगरी कवर्धा की शक्ति पूजा की ख्याति पूरे भारतवर्ष में फैली हुई है। नगर की पूर्व दिशा में तीन तालाबों के समीप माँ राज राजेश्वरी काली का भव्य दरबार सजा हुआ है।जब भी आप काली मन्दिर दर्शन के लिए आयें तो मन्दिर की विशेषताओं को जरुर जानें।पूर्वाभिमुख मन्दिर परिसर में दो प्रवेश द्वार उत्तर और पूर्व में हैं। पूर्व प्रवेश द्वार के सामने पश्चिमाभिमुख विशालकाय महादेव की प्रतिमा स्थापित की गई है। उनके दर्शन के पश्चात जब हम मन्दिर परिसर में प्रवेश करते हैं तो देखें कि प्रवेश द्वार की निर्माण शैली ऐसी है कि प्रवेश करते समय आपका सिर स्वयमेव झुक जायेगा।परिसर में प्रवेश करते समय देववृक्ष पीपल तले कृष्ण जी की मोहक मूर्ति एवं शिवलिंग के दर्शन करते हुए आप दूसरी बार झुकेंगे।परिसर में प्रकृति पूजन हेतु बिल्व वृक्ष, पारिजात,अपराजिता के पौधे मिलेंगे। परिसर का मुख्य आकर्षण अक्षय वटवृक्ष है जिसकी शीतल छाँव तले पूर्व दिशा में उमा महेश्वर की प्राचीन प्रतिमा के दर्शन होते हैं,दक्षिण की ओर मुख किये अष्टभुजी दुर्गा के दर्शन होते हैं यहीं एक प्राचीन शिलालेख है।पश्चिम दिशा में काल भैरव,शिवलिंग और नरसिंग देव के दर्शन होते हैं,उत्तर दिशा में रिच्छिन दाई की प्रतिमा है इसकी मान्यता है कि बच्चा ज्यादा रोता है तो इन पर मुर्रा लाई चना चढ़ाने से वह रोना बंद कर देता है।
अब आपका प्रवेश मुख्य मन्दिर में होने जा रहा है,कुछ पल माता के प्रवेशद्वार की भव्यताऔर आकर्षण को निहारें फिर पीतल की बड़ी घंटी को बजाकर माता को सूचित करें की आप दर्शन के लिए लालायित हैं, यहाँ पर आपका सिर तीसरी बार झुकता है और सामने मोहक, ऊर्जायुक्त और आध्यात्मिकता से भरपूर दरबार सजा हुआ है।माँ काली की अपार शक्ति उत्सर्जित करती हुई काले ग्रेनाईट की प्रतिमा विराजित है जिस पर से दृष्टि का हटना नामुमकिन है।माता चतुर्भुजी हैं और तीन स्वरूपों में- महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती का अद्भुत रूप है,दाहिने हाथ में त्रिशूल,बाएं हाथ में सहस्त्रदल कमल,नीचे हाथ में कमंडल और नीचे दाहिने हाथ में माला धारण किये हैं माँ के सीने में वृश्चिक अंकित हैं।
मन्दिर में दो परिक्रमा पथ है पहला गर्भगृह के बाहर जिसमें परिक्रमा करते हुए आपको माता के नौ रूपों तथा 30वर्षों से प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति के दर्शन होंगे।दूसरा परिक्रमा पथ गर्भगृह में जहां उतरने पर आपका सिर चौथी बार स्वयं झुक जायेगा इस तरह चार बार शीश अपने आप झुकता है। दो तलों वाले इस मन्दिर का ऊपरी तल साक्षात् कैलाश है जहाँ द्वादश ज्योतिर्लिंगो के साथ महाशिवलिंग एवं गणेश जी के दर्शन होंगे। परिसर के दक्षिणी भाग में दो मंजिला ज्योति कक्ष एवं पुष्प कुञ्ज बना हुआ है।विगत 45वर्षों से दीवाली की मध्य रात्रि माँ काली की भव्य महाआरती की जाती है।
माता काली इतनी प्रत्यक्ष हैं की आप अपनी मनोकामना दर्शन करते समय माँ के सम्मुख व्यक्त करें माता उन्हें अवश्य पूरी करती हैं।दोनों नवरात्रि में मनोकामना ज्योति प्रज्ज्वलित की जाती है।कवर्धा नगर की पूर्व दिशा से आने वाली विपदाओं की रक्षक हैं।
जय माता दी
