इंद्रावती को सोने की नाव और चांदी की पतवार भेंट

अर्जुन झा-
जगदलपुर :- बस्तर संभाग का इतिहास विचित्र, मगर मनभावन परंपराओं से भरा हुआ है। यहां के आदिवासी अपने हर काम की शुरुआत ग्राम देवी- देवताओं की पूजा आराधना कर और विधिवत अनुमति लेकर की जा रही है। संभाग में एक गांव ऐसा भी है, जहां के लोग जीवनदायिनी इंद्रावती नदी को देवी तुल्यमानते हैं और हर साल उसे सोने की नाव एवं चांदी की पतवार भेंट करते हैं, फिर ग्राम देवी जलनी आया की पूजा कर उनसे नवाखानी त्यौहार मनाने की अनुमति मांगते हैं। जलनी आया और मां इंद्रावती को बकरा, मुर्गा, मुर्गी, विशेष किस्म के धान की बालियां समर्पित करते हैं। इसके बाद ही ग्रामीण नवाखानी त्यौहार मनाते हैं। यह परंपरा 700 सालों से साल दर साल अनवरत चलती आ रही है। इस साल भी इस परंपरा का निर्वहन किया गया।
अपनी प्राचीन परंपराओं पर कायम यह गांव है बस्तर संभाग के बीजापुर जिले का ग्राम देवी घाटकवाली। इंद्रावती नदी के किनारे बसा ग्राम घाटकवाली अपनी शानदार रूढ़िवादी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। बीजापुर जिला मुख्यालय से महज दस किलोमीटर दूर इंद्रावती नदी के तट पर बसे घाटकवाली गांव में नवाखानी त्यौहार मनाने से पहले इस साल भी में प्राणदायिनी इंद्रावती नदी को सोने की नाव और चांदी की पतवार भेंट की गई गांव गोसिन यानि गांव की मालकिन ग्राम देवी जलनी आया से नवाखानी तिहार मनाने के लिए अनुमति मांगी गई। घाटकवाली बहुत पुराना गांव है। इंद्रावती नदी ही यहां के किसानों और ग्रामीणों के जीवन का आधार है। पुरखों से चली आ रही प्रथा के अनुसार नदी किनारे घाटकवाली के सैकड़ो ग्रामीण जुटते हैं। अपनी प्राणदायिनी मां इंद्रावती को सोने की नाव और चांदी की पतवार भेंट की। ग्राम देवी जलनी आया की छत्र की ग्राम पुजारी मंगतू राम कश्यप ने सेवा अर्जी की। और गांव के ग्रामीण नदी किनारे पहुंचे जहां सेवा अर्जी विधान के बाद सोने की नाव, चांदी की पतवार, सफेद बकरा, चोका मुर्गा, चोकी मुर्गी , 60 दिनों में तैयार होकर पकाने वाले साठका धान की बालियां और लांदा आदि इंद्रावती नदी तथा जलनी आया को भेंट कर गांव में नया खानी तिहार मनाने के लिए अनुमति मांगी गई।

गांव बसा तबसे जारी है परंपरा
घाटकवाली के माटी पुजारी मंगतू राम कश्यप ने बताया कि गांवगोसिन जलनी आया एवं इंद्रावती मैय्या को सोने की नाव एवं चांदी की पतवार, सफेद बकरा, चोका मुर्गा, चोका मुर्गी, साठका धान की बालियां, लांदा आदि समर्पित करने की परंपरा जबसे गांव बसा है तबसे अनवरत चली आ रही है। यह परंपरा लगभग 700 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। इस पारंपरिक घाट जात्रा में गांव के वरिष्ठ नागरिक सीताराम, श्यामसुंदर, पंडरू कश्यप, संपत, इश्पर, विजय, रामनाथ, जुगल, कुमर, मयतर समेत सभी ग्रामीण मौजूद रहें।

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