जिससे अंग्रेज भी खार खाते थे, वह दुर्लभ पेड़ मिला बस्तर के जंगलों में



अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर के जंगलों में एक ऐसा दुर्लभ पेड़ मिला है, जिससे अंग्रेज खार खाते थे और उस प्रजाति के सारे पेड़ों को नष्ट करने पर वे आमादा हो गए थे। इस पेड़ में एक नहीं अनेक खासियतें हैं और इन्हीं खासियतों की वजह से यह पेड़ अंग्रेजों की आंखों में चुभता था। गुस्से में आकर अंग्रेजों ने ऐसे तमाम पेड़ों को नष्ट कर देने का फरमान जारी किया था, लेकिन बस्तर के आदिवासी योद्धा इस प्रजाति के कुछ पौधे चोरी छुपे यहां ले आए थे।
ब्रिटिश शासनकाल में सतपुड़ा के जंगलों में ब्रिटिश सैनिकों से गोंड व कोरकू जनजाति के लड़ाकों की अक्सर भिड़ंत होती रहती थी। लड़ाई में घायल होेने के बावजूद इस जनजाति के लोग जंगली मिली जड़ी बूटियों के उपयोग से अपने घाव को भर कर युद्ध के लिए फिर तैयार हो जाते थे। इससे परेशान ब्रिटिश सैनिकों ने जब स्थानीय लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि दहिमन नाम के पौधे की पत्तियां इन लड़ाकों के लिए संजीवनी है, वे इससे अपनी चोट का उपचार कर लेते हैं।इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने अपनी एक पूरी रेजीमेंट को इस काम पर लगा दिया कि सतपुड़ा के जंगल में जहां -जहां यह पौधा दिखे इसे समूल नष्ट कर दिया जाए। नतीजा यह हुआ कि दहिमन नाम के इस पौधे के अस्तित्व पर संकट आ गया। उसी कालखंड में कुछ जानकार इस पौधे को छिपाकर अन्य जगह पर ले गए और इसका रोपण कर इसे बचाने का प्रयास किया। इसी प्रक्रिया में इस प्रजाति के पौधे बस्तर तक भी आ पहुंचे और आज विशाल पेड़ बनकर खड़े हैं।

ये हैं दहिमन की खासियतें
दहिमन पेड़ के पत्ते रक्त स्त्राव, सर्पदंश व नशा उतारने में असरदार माने जाते हैं। बस्तर के ग्रामीण इस पौधे को दहिमन, दही पलाश व ढेंगन के नाम से जानते पहचानते हैं। वे पत्तों पर रेंगने वाली चीटियों को सूखाकर, भूनकर और चूर्ण बनाकर मिर्गी, माइग्रेन व सुरक्षित प्रसव के लिए उपयोग में लाते हैं। यह जख्म को सुखाने के साथ ही सर्पदंश व नशा उतारने में भी कारगर माना जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि जिस घर में शराब बन रही हो, उस घर की छप्पर पर यदि इसकी डंगाल डाल दी जाए तो शराब नहीं पकती है। इसके अलावा इस पेड़ की छांव में बैठकर शराब पीने से नशा काफूर हो जाता है।

ढूंढा बॉयो साइंटिस्ट ने
जगदलपुर से सटे माचकोट रेंज के जंगल में बॉयोसाइंस के प्रोफेसर डॉ. एमएल नायक, पीजी कॉलेज के जूलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. सुशील दत्ता, डॉ. राजेंद्र सिंह व डॉ. पीआरएस नेगी ने ग्रामीणों से इस पौधे के संबंध में सुना था। टीम ने अपने अनुसंधान के दौरान माचकोट के जंगल में दहिमन पौधे को खोज निकाला। वैज्ञानिकों ने बताया कि लगभग नष्ट होने के कगार पर इस पौधे के संरक्षण व संवर्धन के लिए वे प्रयास कर रहे हैं। प्रोफेसर्स ने बताया कि इस पौधे का बॉटनीकल नाम कार्डिया मेकलियोडी है। यह एंटी वेनम, एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी बैक्टीरियल एंटी एलरगेसिक, एंटी ऑक्सीडेंट व एंटी माइक्रो बैक्टीरियल गुणों से भरपूर होता है। दहिमन की पत्तियां, छाल व जड़ का उपयोग कई तरह की बीमारियों में बेहद कारगर है। दहिमन के अनुसंधान में शामिल डॉ. सुशील दत्ता ने बताया कि माचकोट में इसका पाया जाना बेहद आश्चर्यजनक है। ऐसे पौधों को बचाना जरूरी है।

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