जिस धरा पर पड़े थे प्रभु श्रीराम के शुभ कदम, उस धरा पर उपेक्षित है राम वनगमन पथ सूचक
-अर्जुन झा-
जगदलपुर। भारतीयों के आराध्य भगवान श्रीरामचंद्र का छत्तीसगढ़ से गहरा नाता रहा है। छत्तीसगढ़ यानि कौशल प्रदेश भगवान राम का ननिहाल तो है ही, यहां के जल, जंगल, जमीन, पहाड़ों, गुफाओं, कंदराओं और नदियों से भी उनका विशेष जुड़ाव रहा है। खासकर बस्तर की धरा से उनकी अनेक स्मृतियां जुड़ी हैं। इन पावन “स्मृतियों” पर गर्द और धुंध का काला साया मंडरा रहा है। भगवान राम की स्मृतियों को दर्शाने वाल सूचना फलक ही बुरी तरह बदहाल हो चुका है।
वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम बस्तर के भी विभिन्न जंगलों, पहाड़ों से होकर गुजरे थे। उन्होंने बस्तर के सुकमा जिले के जंगल के जिस भाग पर कुछ दिन तक विश्राम किया था, वह भाग आज रामाराम गांव के नाम से जाना जाता है और वहां प्रभु श्रीराम का भव्य प्राचीन मंदिर भी है। पुण्य सलिला शबरी नदी ने प्रभु श्रीराम के पांव पखारे थे। यह नदी आज भी सुकमा जिले में कलकल बहती है और प्रभु श्रीराम की गाथा सुनाती है। भगवान रामचंद्र बस्तर जिले के चित्रकोट क्षेत्र में भी पधारे थे। चित्रकोट भगवान राम के वनवास का बड़ा ही महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है।वनगमन से जुड़े स्थलों की जानकारी देने वाला राम वन गमन सूचना बोर्ड आज स्वयं बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। चित्रकोट में भगवान रामचंद्र के वनगमन पथ से जुड़ी जानकारियों वाला जो बोर्ड लगाया गया था, वह आज बुरी तरह जर्जर हो चुका है। बोर्ड पर लिखी जानकारी धुंधली पड़ चुकी है, रंग फीके हो गए हैं और रखरखाव के अभाव में इसकी उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई है। ऐसे में इस सूचना बोर्ड का जीर्णोद्धार आवश्यक है, ताकि श्रद्धालुओं और पर्यटकों को सही जानकारी मिल सके तथा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का सम्मान बना रहे। यह केवल एक बोर्ड नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम की स्मृतियों और हमारी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। उम्मीद है कि संबंधित विभाग शीघ्र ही इस बोर्ड की मरम्मत एवं नवीनीकरण का कार्य कराएगा।
