बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू की सहभागिता



जगदलपुर:- भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय परंपराओं का अनूठा संगम छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में देखने को मिलता है। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा, जो लगभग 75 दिनों तक चलने वाला देश का सबसे लंबा दशहरा उत्सव है, अपनी अनोखी रीति-रिवाजों और सामाजिक महत्व के लिए जाना जाता है। इस उत्सव के अंतर्गत आयोजित होने वाले ऐतिहासिक मुरिया दरबार कार्यक्रम में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू शामिल होंगी। यह कार्यक्रम जगदलपुर के सिरहासार भवन में आयोजित किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि मुरिया दरबार कार्यक्रम में किसी राष्ट्रपति की यह पहली शिरकत है। इससे बस्तर की जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक संवाद व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी।
मुरिया दरबार बस्तर दशहरा की प्रमुख पारंपरिक रस्मों में से एक है। ऐतिहासिक रूप से बस्तर रियासत के समय दशहरा के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद राजा एक दरबार लगाते थे, जिसमें स्थानीय लोग अपनी समस्याएं रखते थे। इसे आदिम जन संसद भी कहा जाता है। आज राजशाही समाप्त हो चुकी है, लेकिन यह परंपरा जीवित है। इसमें मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरीन और अन्य पारंपरिक सामाजिक नेतृत्व के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। ये लोग बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से आकर प्रशासन और समाज के साथ संवाद करते हैं। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू की इस कार्यक्रम में उपस्थिति इस सदियों पुरानी परंपरा को विशेष गरिमा प्रदान करेगी।
राष्ट्रपति का छत्तीसगढ़ दौरा 22 और 23 अक्टूबर को तय है। 23 अक्टूबर को वे जगदलपुर पहुंचेंगी। कार्यक्रम के अनुसार वे पहले मां दंतेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगी और फिर सिरहासार भवन में मुरिया दरबार में भाग लेंगी। वहां वे मांझी-चालकी समुदाय के सदस्यों से विशेष बातचीत करेंगी। इसके बाद लालबाग मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगी। बस्तर के सांसद और दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने राष्ट्रपति को औपचारिक निमंत्रण दिया था। इससे पहले बस्तर के मांझी दल और बस्तर पंडुम के विजेताओं ने राष्ट्रपति भवन में पहुंचकर उन्हें आमंत्रित किया था, जिसे राष्ट्रपति ने स्वीकार किया।
यह अवसर बस्तर क्षेत्र के बदलते परिदृश्य को भी दर्शाता है। लंबे समय तक क्षेत्र में नक्सलवाद एक बड़ी समस्या थी, जिसने विकास और शांति को प्रभावित किया था। अब नक्सलवाद का अंत हो चुका है और क्षेत्र शांति एवं विकास के पथ पर अग्रसर है। राष्ट्रपति की उपस्थिति इस सकारात्मक बदलाव को और मजबूत करेगी तथा जनजातीय समाज के विश्वास को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू स्वयं जनजातीय पृष्ठभूमि से आती हैं। वे भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं। उनकी इस सहभागिता से बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक कलाएं, सामाजिक व्यवस्था और परंपराएं राष्ट्रीय मंच पर और अधिक उजागर होंगी। मुरिया दरबार केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की आवाज उठाने और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने का माध्यम है। राष्ट्रपति की उपस्थिति इस बात का प्रतीक है कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था जनजातीय समाज की परंपराओं और उनकी आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील है।
बस्तर दशहरा समिति और प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मुरिया दरबार सिरहासार भवन में ही आयोजित होगा। आम जनता की सुविधा के लिए लालबाग मैदान में अलग से प्रदर्शनी और जनसभा का आयोजन किया जाएगा। राज्यपाल, मुख्यमंत्री और अन्य जनप्रतिनिधियों के भी शामिल होने की संभावना है। यह अवसर बस्तर क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। यह न केवल सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाएगा, बल्कि पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और युवाओं में अपनी जड़ों के प्रति जुड़ाव को भी मजबूत करेगा।
कुल मिलाकर, राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू की मुरिया दरबार में पहली बार होने वाली सहभागिता बस्तर की अनूठी सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान देने वाला ऐतिहासिक क्षण सिद्ध होगी। यह कार्यक्रम भारत की विविधता में एकता, जनजातीय विरासत के संरक्षण और क्षेत्र में स्थापित शांति के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। बस्तरवासी इस अवसर को उत्साह और गर्व के साथ देख रहे हैं।

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