बस्तर दशहरे में जीवंत हुई अनूठी परंपरा
जगदलपुर, 22 अक्टूबर 2026/ विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरे में सामाजिक समरसता, समृद्ध लोक-आस्था और सदियों पुरानी परंपरा का एक बेहद जीवंत दृश्य देखने को मिला, जब ‘भीतर रैनी’ के बाद निभाई जाने वाली बहुप्रतीक्षित ‘बाहर रैनी’ की रस्म पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुई। परंपरा के मुताबिक, भीतर रैनी की रस्म पूरी होते ही माड़िया जनजाति के लोगों ने आठ चक्कों वाले विशालकाय रथ को बुधवार को चुपचाप खींचकर शहर से दूर लालबाग स्थित कुम्हड़ाकोट के घने जंगलों में छिपा दिया था। यह प्रतीकात्मक “रथ चोरी” राजा और प्रजा के बीच संवाद, अपनत्व और मान-मनौव्वल की उस अद्भुत बस्तर संस्कृति का अभिन्न अंग है, जो सदियों से चली आ रही है।
इसके अगले दिन गुरुवार को जैसे ही ‘बाहर रैनी’ की रस्म शुरू हुई, बस्तर राजपरिवार के सदस्य चोरी हुए उस विशाल रथ को ढूंढते हुए सीधे कुम्हड़ाकोट के जंगलों में जा पहुंचे। वहां उन्होंने परंपरागत रूप से रूठे माड़िया समाज के लोगों और ग्रामीणों के बीच बैठकर आत्मीय संवाद स्थापित किया। राजपरिवार के सदस्यों ने ग्रामीणों की कुटिया में पहुंचकर उनकी मान-मनौव्वल की और इस तरह दोनों पक्षों के बीच एक बेहद सौहार्दपूर्ण और आत्मीय माहौल निर्मित हुआ।

इस सुलह के उपरांत जंगल में ही पारंपरिक ‘नवाखानी’ का विशेष आयोजन किया गया, जहां नई फसल के आगमन की खुशी में नए चावल से तैयार खीर का नैवेद्य अर्पित किया गया। राजपरिवार के सदस्य श्री कमलचंद भंजदेव, सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष श्री महेश कश्यप, महापौर श्री संजय पाण्डे और ग्रामीणों ने एक साथ पंगत में बैठकर यह पावन प्रसाद ग्रहण किया, जिसने बस्तर की गहरी सामाजिक समरसता और अटूट सांस्कृतिक एकता को फिर से रेखांकित किया। मान-मनौव्वल और नवाखानी की इस रस्म के संपन्न होते ही माड़िया समुदाय के लोग और राजपरिवार के सदस्य एकजुट हो गए और पूरे शाही ठाठ-बाट, पारंपरिक गाजे-बाजे और जयकारों के साथ उस विशालकाय रथ को खींचते हुए वापस राजमहल के सिंह द्वार ले आए, जिसके साथ ही बस्तर दशहरे की बहुप्रतीक्षित रथ परिक्रमा रस्म का विधिवत समापन हो गया।
