“शाही दशहरा कवर्धा”
(लेख,, वरिष्ठ साहित्यकार, आदित्य श्रीवास्तव)

कवर्धा :- विजयादशमी भारतवर्ष का एक प्रमुख पर्व है।छत्तीसगढ़ में बस्तर तथा कवर्धा का दशहरा विशेष दर्शनीय होता है।आज हम कवर्धा के शाही दशहरा के विषय में जानते हैं कि यहाँ क्या कुछ ख़ास है।

कवर्धा के दशहरे के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि यहाँ रियासत स्थापना काल अर्थात सन1751से1760 के मध्य दशहरे का आयोजन प्रारम्भ हो गया था। रियासत के संस्थापक राजा स्व. महाबली सिंह वीरता और शौर्य की साक्षात् मूर्ति थे और विजयादशमी के दिन शस्त्र पूजन की विशेष परम्परा है।इतिहास की बातें पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं और वे किस्से कहानियों के रूप में आते हैं।उक्त संबंध में भी वरिष्ठ सुधीजनों द्वारा बताया जाता है कि तब रामलीला का मंचन होता था और श्रीराम-लक्ष्मण और रावण बने कलाकार प्रत्यक्ष रूप में दशहरा उत्सव में भाग लेते थे।
कवर्धा के अत्यंत लोकप्रिय राजा स्व.धर्मराज सिंह के कार्यकाल सन 1920 से दशहरा उत्सव समिति बनाने की परम्परा शुरू की गई।उक्त समिति में आस पास के एवं नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों को शामिल को किया जाता रहा है।यह परम्परा वर्तमान राजा श्री योगेश्वर राज सिंह ने भी प्रचलित रखा है।

विजयादशमी की विशेष प्रक्रिया:-
वर्तमान में जो प्रक्रिया है वह राजा महाबली सिंह के समय से चली आ रही है। (हालाँकि राजमहल का स्थान तीन बार बदला है।)विजयादशमी की सुबह रियासत प्रमुख राजा साहब और युवराज स्नान करके पाली पारा स्थितअपनी कुल देवीमाँ दंतेश्वरी के मन्दिर में दर्शन पूजन करने जाते हैं (पहले राजमहल से पैदल चलकर जाते थे)।बाद में खेड़ापति हनुमान जी,श्री राधाकृष्ण मन्दिर में दर्शन करते हुए माँ सतबहनिया देवी के दर्शन के पश्चात महल पहुंचते हैं। राजमहल में पुन:पूजन एवं शस्त्र पूजन करते हैं तथा प्रथम तल पर स्थित निवास से राजसी वेशभूषा से अलंकृत होकर जब रथ में विराजित होने के लिए महल से निकलते हैं उस समय रानियाँ, युवरानियाँ पूरे श्रृंगारयुक्त होकर राजा और युवराज को तिलक लगाकर मंगल आरती करती हैं।
मोती महल के दरबार हाल से जैसे ही राजा निकलते हैं,महल परिसर में एकत्रित विशाल जन समूह उनकी जय जयकार करते हैं। महल के मुख्य द्वार (जिसे सिंग दरवाजा कहते हैं)से सर्वप्रथम श्रीराम लक्ष्मण एवं हनुमान जी का सुसज्जित रथ निकलता है,उसके पीछे-पीछे राजा का रथ चलता है,रथ में राजपुरोहित स्वस्ति वाचन निरंतर करते रहते हैं। स्थानीय भोजली तालाब के पास से होकर सरदार पटेल मैदान(पूर्व में महल का उपवन था)में आतिश बाजी होती है फिर विशालकाय रावण का वध श्री राम करते हैं। इसके बाद राजा नगर भ्रमण करते हैं तथा लोगों से सम्मान प्राप्त करते हुए अपने पूर्वजों द्वारा निर्मित नगर के सिद्धपीठ माँ शीतला मन्दिर में राजा साहब पूजा करते हैं तथा ज्योति कलश को संकरी नदी के रामघाट(पुराना राजाघाट)में विसर्जित करने जोत के पीछे पीछे जाते हैं और विसर्जन के बाद पुन: राजमहल पहुंचते हैं यहाँ दशहरे का कारवां समाप्त होता है। कुछ घंटों के अन्तराल के बाद रात्रि में राजमहल में राजा का दरबार लगता था जिसमें प्रत्येक गौटिया एक बकरा या उसके बराबर की राशि ‘दशहरा टीका’ के रूप में हर वर्ष राजा को देने की परम्परा थी। (अष्टराज अम्भोज)।राजा को जोहारने एवं नज़राना भेंट करने नगर के गणमान्य लोग उपस्थित होते थे। जिन्हें राजा की ओर से बीड़ा पान एवं शमी पत्ता (सोनपत्ती) दी जाती थी।तथा दरबार हाल में नृत्य संगीत का आनन्द लिया जाता था।राजा से भेंट की परम्परा राजा योगेश्वर राज सिंह आज भी कायम रखे हुए हैं।
पुराने समय से यह मान्यता है कि दशहरे के दिन नीलकंठ और राजा का दर्शन किया जाता है और लंकाविजय के उपलक्ष में सोनपत्ती एक दूसरे को दिया जाता है।कवर्धा के दशहरे की एक और ख़ास बात है कि बैगा जनजाति के लोग 100-150 किमी दूर वनांचल से दो दिन पूर्व हीअपनी पारम्परिक वेशभूषा मे कवर्धा पहुंचकर संकरी नदी के तट पर डेरा डाल देते हैं। उनके लिए दशहरे का एक ही महत्व है कि उन्हें अपने राजा का दर्शन मिल जाए।कवर्धा की शाही दशहरा को देखने लगभग 40से 50 हजार लोग आते हैं इनमें विदेशी सैलानी भी सम्मिलित होते हैं। वर्तमान में शाही दशहरा में राजा योगेश्वर राज सिंह और राजकुमार मैखेलेश्वर राज सिंह और रानी कृतिदेवी सिंह शाही परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। कवर्धा वह जगह है जहाँ आज भी राज परिवार को सम्मान दिया जाता है।
वरिष्ठ साहित्यकार, आदित्य श्रीवास्तव

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