भोपालपटनम ब्लॉक में आदिवासी जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा !
भोपालपटनम। बीजापुर जिले के भोपालपटनम विकासखंड अंतर्गत अन्नारम गांव की बंद पड़ी प्राथमिक शाला को पुनः चालू करवाने के प्रयासों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं शिक्षा समिति के सभापति पेरे फुलैया ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
श्री फुलैया ने कहा है कि अन्नारम की प्राथमिक शाला को पुनः प्रारंभ करने के लिए उन्होंने स्वयं वल्वा चलपतराव, वासम कमला एवं स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर लगातार प्रयास किया। उन्होंने बताया कि शिक्षक श्री चलपतराव को बुलाकर स्कूल में सर्वे कराया गया, जिसमें 12 बच्चों की उपस्थिति दर्ज की गई। ग्रामीणों ने भी बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजने की जिम्मेदारी ली। इसके उपरांत ग्राम पंचायत द्वारा प्रस्ताव पारित कर शासन प्रशासन से विद्यालय खोलने हेतु विधिवत निवेदन किया गया। तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी कंडिक नारायण को इस संदर्भ में अवगत भी करवाया गया था। विद्यालय प्रारंभ हो गया पर जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा की गई। 26 जुलाई को प्राथमिक शाला अन्नारम में नवप्रवेशी कक्षा पहली के बच्चों का स्वागत किया गया। इस अवसर पर एपीसी जाकिर खान, खंड शिक्षा अधिकारी नागेंद्र पड़िशाला, सहायक खंड शिक्षा अधिकारी एटला श्रीनिवास, खंड स्त्रोत समन्वयक सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे। बच्चों को तिलक कर विद्यालयीन सामग्री वितरित की गई। इस आयोजन में जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं शिक्षा समिति के सभापति श्री फुलैया को आमंत्रित नहीं किया गया, जिससे वे आहत हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एपीसी जाकिर खान आदिवासी जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करते रहे हैं और यह कोई पहली घटना नहीं है। पूर्व में भी उन्हें दो-तीन बार नजरअंदाज किया गया है।
श्री फुलैया ने कहा- मैं शिक्षा समिति का सभापति हूं, लेकिन मुझे ही आमंत्रित नहीं किया गया। यह केवल मेरा नहीं, बल्कि समस्त आदिवासी समाज का अपमान है। यह अधिकारी बार-बार आदिवासी जनप्रतिनिधियों के साथ दुर्व्यवहार करता है। श्री फुलैया ने मांग की है कि एपीसी जाकिर खान को तत्काल वर्तमान पद से हटाकर मूल संस्थान में भेजा जाए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब युक्तियुक्तकरण के अंतर्गत अन्य शिक्षक स्थानांतरित हो चुके हैं, तो इन्हें क्यों नहीं हटाया गया? उन्होंने यह भी पूछा कि जिले के लिए जाकिर खान की शिक्षा क्षेत्र में उपलब्धि क्या रही है? उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि व्यक्तिगत रूप से उन्हें नहीं बुलाया गया तो कोई बात नहीं, परंतु जनपद पंचायत के अन्य पदाधिकारियों को भी नहीं बुलाना गंभीर चिंता का विषय है। यह आदिवासी प्रतिनिधियों की निरंतर हो रही उपेक्षा का प्रमाण है। इस मुद्दे को वे समस्त आदिवासी समाज के समक्ष रखेंगे और समाज जो भी निर्णय लेगा, वह उन्हें मान्य होगा।
