आम बस्तरिहा के जन्म से मृत्यु तक का सहचर है सरई पेड़
–अर्जुन झा-
जगदलपुर। जहां पड़े थे प्रभु श्रीराम के चरण उस बस्तर को दंडकारण्य और सरई साल वनों का द्वीप भी कहा जाता है। साल या सरई का वैज्ञानिक नाम शोरा रोबुस्ता है। यहां की जनजातीय संस्कृति में साल जिसे सरई और सरगी पेड़ भी कहा जाता है, का विशेष महत्व है और इसे उनके जीवन का आधार भी माना जाता है। साल पेड़ की लकड़ी, पत्ता, फल, टहनी और बीज यानि हर हिस्सा बस्तर के आदिवासियों के दैनिक जीवन, लोक रीति-रिवाज और अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है।
सुबह उठते ही यहां के आदिवासी सरई की कोमल टहनी से दातून बनाकर दांतों और जीभ की सफाई करते हैं। साल के पत्तों से दोना पतल, चिपड़ी, डोबली आदि बनाए जाते हैं, जिनका उपयोग पारंपरिक पर्व, शादी-विवाह, मृत्यु भोज व अन्य सामूहिक कार्यों में भोजन परोसने के लिए होता है। सूखे पत्तों को जरुरत पड़ने पर पानी में भिगोकर फिर से दोना पत्तल बनाते हैं, जिससे इसका उपयोग लंबे समय तक संभव रहता है। इससे रोजगार भी जुड़ा है, क्योंकि लोग इन्हें बाजार में बेचकर आय अर्जित करते हैं। साल की लकड़ी इमारती लकड़ी के रूप में घर निर्माण, शादी के मंडप, जलावन आदि में काम आती है। साल के बीजों से तेल निकाला जाता है, जिसका उपयोग खाना पकाने, शरीर पर मलने व दीपक जलाने में किया जाता है। साल के पेड़ से प्राप्त गोंद (लासा) से धूप व अन्य धार्मिक सामग्री बनाई जाती है, जो देवी-देवताओं की हवन-पूजा में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख सामाग्री है। साल के फल बस्तर के ग्रामीण इकट्ठा करते हैं और इससे तेल व औषधि बनाते हैं। साल पेड़ के नीचे जमीन से निकलने वाला बोडा का इस्तेमाल सब्जी के रूप मे होता है जो पहली बारिश के बाद निकलता है मौसमी सब्जी होने के कारण यह बाकी सब्ज़ियों से बहुत महंगा होता है।
पूजा पाठ में है बड़ा महत्व
बस्तर के जनजातीय देवी देवताओं को महुआ रस, सरई पत्ते की चिपड़ी (दोनी) में ही चढ़ाया जाता है। शादी के बाद नवदंपति को परंपरा के अनुसार सरई के 16 पत्तों की पत्तल पर भोजन कराया जाता है। एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, बस्तर के राजा ने अन्य राजाओं को बताया कि यहां के लोग रोज नई थाली सरई की पत्तल में खाना खाते हैं और बार-बार धोकर वही थाली उपयोग नहीं करते। यह उनके आत्मसम्मान और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। हरे पत्ते से बने दोने या पत्तल पर भोजन करने के कई फायदे हैं, ये आयुर्वेद, विज्ञान और भारतीय पारंपरिक अनुभव से सिद्ध माने जाते हैं।
एंटी बैक्टीरियल गुण भी
सरई पान से बने दोना पत्तल में भोजन करने से उसमें प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल गुण मिल जाते हैं, जिससे भोजन अधिक शुद्ध और सुरक्षित बन जाता है। केले, साल, पलाश पत्तों से जो पत्तल बनती है, वह पाचन शक्ति और अग्नि को बढ़ाती है, पेट को ठंडक देती हैं और गैस की समस्या कम करती है। पत्तलों के प्राकृतिक रस मधुर, अम्ल, लवण, कटु आदि भोजन में घुलकर उसका स्वाद और पोषकता को और भी बढ़ा देते हैं।पत्तल पर खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) में वृद्धि होती है, और पेट व रक्त संबंधी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है, जैसे कृमि, कफ, खांसी आदि।
इको फ्रेंडली है यह
पर्यावरण के लिए भी यह तरीका फायदेमंद है क्योंकि दोने-पत्तल 100 प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल हैं, उन्हें धोने की ज़रूरत नहीं, पानी की बचत होती है और यह कचरा नहीं बढ़ाता। दोने-पत्तल में खाने से सोने चांदी के बर्तन में खाने जितना पुण्य और सात्विकता मिलती है।धार्मिक दृष्टि से भी यह पवित्र और अनुष्ठानों योग्य माना जाता है। इसलिए बस्तर में साल को ‘हरा सोना’ कहा जाता है, क्योंकि यह हर स्तर पर जीवन से जुड़ा, पर्यावरण के अनुकूल और अर्थ तंत्र को मजबूतीदेने वाला साधन है।
इस प्रकार, साल वृक्ष सिर्फ जंगल नहीं, बल्कि बस्तर के निवासियों की संस्कृति, अर्थव्यवस्था, और परंपरा का अमूल्य खजाना है।
सरकार से अपेक्षाएं
हमारी सरकारें लोकल फॉर वोकल, आत्मनिर्भरता, स्वदेशी पर बहुत ज्यादा फोकस कर रही हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि सरई के पेड़, पत्तों, बीज, बोड़ा, काष्ठ आदि पर आधारित कुटीर उद्योग को बढ़ावा दे, इन पर आधारित बड़े उद्योग या प्रोसेसिंग प्लांट बस्तर में लगवाएं। इससे यहां के लोगों को भरपूर रोजगार मिलेगा, वे आत्मनिर्भर बन सकेंगे। साथ ही सनातन परंपरा के अनुसार पूजा पाठ, तीज त्योहारों, श्राद्ध व मृत्यु कर्म में सरई की अहमियत का भी प्रचार प्रसार होगा। इससे प्लास्टिक के दोना पत्तलों और गिलास से मुक्ति मिलेगी तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
