रहस्यों से भरी हैं बस्तर दशहरा की सभी रस्में, सहकार का सबसे बड़ा उदाहरण भी है यह महापर्व

अर्जुन झा-
जगदलपुर बस्तर दशहरा और यहां की रथयात्रा संभवतः देश में सबसे ज्यादा लंबे समय तक चलने वाला शक्ति उपासना का महापर्व है। यह महापर्व अपने आप में कई रहस्यों को समेटे हुए है। इसकी सभी रस्मे रहस्यमयी हैं और सहकार की अनुपम उदाहरण भी।यह एक ऐसा महापर्व है, जिसमें प्रायः सभी जाति समुदायों की भूमिका तय रहती है।
ऐतिहासिक बस्तर दशहरा महापर्व 75 दिनों तक चलता है। इस पर्व में सहकारिता का अनूठा समन्यव देखने को मिलता है। बस्तर में निवासरत सभी जाति वर्ग के लोग इसमें अपनी पूरी सहभागिता निभाते हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सरकारी खर्च पर यह भव्य एवं विशाल आयोजन प्रतिवर्ष किया जाता है। बस्तर दशहरा पर्व को देखने देश-विदेश के पर्यटक काफी संख्या में पहुंचते हैं और यहां की परंपरा एवं संस्कृति को देखकर अभिभूक्त हो उठते हैं। बस्तर का दशहरा मूल रूप से बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा अर्चना पर ही आधारित है। यह शक्ति उपासना का ही बड़ा पर्व है।

सांवर जाति का योगदान
हरियाली अमावस्या के दिन ग्राम बिलोरी से पेड़ काटकर लकड़ी लाई जाती है, जिसे ठुरलू खोटला कहते हैं। इसकी विधि विधान पूर्वक पूजा अनुष्ठान की जाती है। इस लकड़ी से रथ निर्माण के औजार बारसी हथोड़ा, टंगिया आदि का ढेटा (मूठ) बनाया जाता है। इसी दिन से ही बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत होती है। इसके पश्चात रथ निर्माण हेतु पेड़ काटे जाते हैं, लकड़ियां लाई जाती हैं। जगदलपुर निकट स्थित ग्राम बेड़ा उमरगांव के सांवर जाति के लोगों द्वारा रथ निर्माण का कार्य किया जाता है। रथ के पाहियों के निर्माण के समय नार फोड़नी विधान किया जाता है।

पनका समाज का महत्व
इसके पश्चात मगर मुही विधान संपन्न होता है, फिर डेरी गड़ाई रस्म सिराहासार भवन में की जाती है। इन सभी विधानों में बस्तर की परंपरा अनुसार मोंगरी मछली, अंडे व बकरे की बलि दी जाती है मूल दशहरा का पर्व पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन स्थानीय पथरागुड़ा चौक के पास स्थित कांछनगुड़ी में कांछन देवी विधान किया जाता है। इसमें पनका जाति की कुंवारी कन्या पर मां दंतेश्वरी आती है उसे बेल कांटों से बने झूले पर झुलाया जाता है। इस समय बस्तर राज परिवार के सदस्य द्वारा देवी की पूजा अर्चना के बाद बस्तर दशहरा पर्व के आयोजन की अनुमति मांगी जाती है। देवी स्वरूपा कुंवारी कन्या द्वारा आशीर्वाद के रूप में फूल प्रदान कर अनुमति दी जाती है। इसके पश्चात बस्तर दशहरा महापर्व का मूल अनुष्ठान एवं आयोजन प्रारंभ होता है।

जोगी जाति की भूमिका
प्रतिपदा के दिन स्थानीय सिरहासार भवन में जोगी बिठाई रस्म पूरी की जाती है। इसमें बड़े आमाबाल गांव के जोगी परिवार का युवक 9 दिनों तक कठोर तपस्या करते बैठे रहता है। इसके पश्चात राजमहल परिसर में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर को बस्तर राज परिवार के सदस्य द्वारा पूरे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर कलश स्थापना की जाती है तथा मां दंतेश्वरी मंदिर में अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है इसके पश्चात घी एवं तेल के आस्था के दीप लोगों द्वारा जलाया जाता है इसकी व्यवस्था एवं देखरेख के लिए अखंड ज्योत प्रबंधन समिति भी गठित की गई है।कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि पूजा अनुष्ठान का कार्यक्रम पूरे विधि विधान के साथ मंदिर में 9 दिनों तक चलता है।

वही बस्तर दशहरा महापर्व का मुख्य आकर्षण रथ परिक्रमा का शुभारंभ द्वितीय तिथि की शाम होता है।

फूल रथ परिक्रमा
चार चक्के वाले फूल रथ पर मां दंतेश्वरी के छत्र को सम्मान रथारूढ़ करने के बाद मां मावली मंदिर के सामने फूलों तथा आकर्षक कपड़ों से सुसज्जित रथ को खींचकर सिराहासार चौक से जय स्तंभ चौक गुरु नानक चौक होते हुए मां दंतेश्वरी मंदिर के समक्ष लाया जाता है। जहां ससम्मान मां दंतेश्वरी की छत्र को उतार कर मंदिर में ले जाया जाता है, यह क्रम सप्तमी तक चलता है। रथ परिक्रमा के दौरान विभिन्न लोकनर्तक दलों का पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर झूमते नाचते चलना आकर्षण का केंद्र बना रहता है।


निशान जात्रा
इसके पश्चात महा अष्टमी के दिन निशा जात्रा विधान के अंतर्गत बस्तर राज परिवार के सदस्यों द्वारा महल से पूरे राज्यकिय वेशभूषा में अपने पूरे राज्य परिवार के सदस्यों के साथ आकर्षक शोभायात्रा के रूप में महल से निकलकर अनुपमा टॉकीज के पास स्थित निशान जात्रा मंडप में बस्तर के विभिन्न देवी देवताओं एवं पूर्वजों का पूजा अनुष्ठान बस्तर के परंपरा अनुसार एवं विधि विधान के साथ करते हैं। इस अवसर पर 11 बकरों का बलि दी जाती है। यह विधान मध्य रात्रि में संपन्न होता है।

माई की डोली का आगमन
नवमी तिथि को मंदिर में कुंवारी कन्या भोजन के पश्चात सिरहासार मे 9 दिनों से व्रत में बैठे जोगी उठाई रस्म की जाती है। इसके बाद रात्रि लगभग 8 बजे दशहरा का विशिष्ट एवं आकर्षक मावली पड़घाव विधान आयोजित किया जाता है। मावली पड़घाव विधान के लिए दंतेवाड़ा से माईजी की डोली जगदलपुर के जिया डेरा पहुंचती है जिया डेरा से मावली पढ़घाव हेतु माई जी की डोली को गाजा बाजा एवं आतिशबाजी के साथ यहां से मां दंतेश्वरी मंदिर हेतु ले जाया जाता है। इस विधान को देखने के लिए भारी संख्या में शहर एवं आसपास के ग्रामीणों के साथ बाहर से आए सैलानी भी सड़क के दोनों और खड़े होकर माई जी की डोली का स्वागत करते हैं। सभी श्रद्धालु माई जी की डोली के दर्शन के लिए आतुर रहते हैं। इस अति विशिष्ट आयोजन के लिए राजमहल सड़क को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है।कुटरु बाड़ा के समीप स्वागत मंच पर बस्तर राज परिवार के सदस्य द्वारा दंतेवाड़ा से आई मां दंतेश्वरी की डोली को पूरे सम्मान एवं बस्तर की परंपरा अनुसार भव्य स्वागत किया जाता है। माई जी की डोली को कंधे पर उठाकर मां दंतेश्वरी के मंदिर में ले जाकर विधि विधान पूर्वक पूजा अनुष्ठान किया जाता है।

माड़िया जनजाति की सहभागिता
बस्तर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा के अंतर्गत विजयादशमी के अवसर पर 8 चक्का वाले विशालकाय रथ पर मां दंतेश्वरी के छत्र को ससम्मान रथारुढ़ कर बस्तर के किलेपाल परगना के माड़िया जनजाति के लोगों द्वारा उत्साह एवं श्रद्धा के साथ रथ को खींचा जाता है। रथ को मावली मंदिर के सामने से खींचते हुए सिरहासार चौक से गोल बाजार, जय स्तंभ चौक, गुरु नानक चौक से मां दंतेश्वरी मंदिर के सामने पहुंचाया जाता है। यहां पर आकर्षक आतिशबाजी की जाती है। पुलिस बल द्वारा सलामी दी जाती है।

*विशालकाय रथ की चोरी*
फिर मां दंतेश्वरी के छत्र को ससम्मान उतार कर मंदिर में ले जाया जाता है। इसके बाद बस्तर की परंपरा अनुसार इस विशालकाय रथ को चुराकर कुम्हाड़ाकोट के जंगल में ले जाकर छुपा दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि ग्रामीण राजा के साथ नया खाने की शर्त पर रथ छोड़ने को राजी होते हैं। राजा उनकी शर्त को मानते हुए उनके साथ नया खाकर रथ के साथ वापस लौटते हैं। यह परंपरा इसी तरह चली आ रही है। हर वर्ष रथ को ढूंढते हुए बस्तर के राजा एवं राजगुरु राजपुरोहित सुकमा जमीदार एवं बस्तर के सभी समाजों के प्रमुख कुम्हड़ा कोट में नया खानी विधान में शामिल होते हैं। आम जनों के साथ नए चावल से बने खीर का सेवन कर नया खाया जाता है। इसके पश्चात सुसज्जित रथ पर मां दंतेश्वरी के छत्र को ससम्मान रथारूढ़ कर कुम्हड़ा कोट से मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाता है। दशहरा में रथ के सामने बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे देवी देवताओं की डोली और छत्र के साथ लाठ लिए हुए भक्त झूमते नाचते हुए रथ को खींचते हैं।

मुरिया दरबार का महत्व
इसके पश्चात स्थानीय पथरागुड़ा में स्थित कांछन जात्रा मंडप में सभी देवताओं की पूजा अनुष्ठान दंतेश्वरी मंदिर के प्रमुख पुजारी द्वारा की जाती है।इस अवसर पर बस्तर की परंपरा अनुसार बलि भी दी जाती है। दोपहर को सिरहासार भवन में मुरिया दरबार का आयोजन होता है मूरिया दरबार में राजा के समक्ष सभी गांवों से आए पुजारी, मांझी, चालकी, कोटवार, पटेल, मेंबर, मेंबरिन के साथ गणमान्य नागरिक अपनी शिकायत एवं सुझाव पेश करते हैं। आजादी के बाद इस परंपरा का निर्वाह हो रहा है किंतु अब मुरिया दरबार में राज्य के मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि उपस्थित होते हैं। 48 वर्ष के बाद राज परिवार के कमलचंद भंजदेव वर्ष 2013 को मुरिया दरबार में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ। रमन सिंह के साथ शामिल हुए थे। मुरिया दरबार के दूसरे दिन बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से आए देवी देवताओं की स्थानीय महात्मा गांधी स्कूल परिसर में आयोजित कुटुंब जात्रा विधान अंतर्गत पूजा अर्चना कर स सम्मान विदाई दी जाती है। इस अवसर पर सभी देवी देवताओं को बस्तर की परंपरा अनुसार बकरे, मुर्गे, बतख, अंडे की बलि दी जाती है। इसके अगले दिन दंतेवाड़ा से आई मां दंतेश्वरी जी की डोली को ससम्मन दंतेश्वरी मंदिर से राज परिवार द्वारा पूजा अनुष्ठान कर विदाई दी जाती है इस अवसर पर माई जी की डोली को दर्शन हेतु जन सैलाब उमड़ पड़ता है। पुष्प वर्षा करते हुए लोग माई जी की डोली को विदा करते हैं। राजमहल से जिया डेरा तक भक्तों का ताता लगा रहता है। इसके साथ ही विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महापर्व संपन्न होता है। बस्तर दशहरा महापर्व को संपन्न कराने में जिले के प्रशासकीय अधिकारी कर्मचारियों के साथ पुलिस विभाग के अधिकारी कर्मचारी भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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