सड़ गया पीडीएस का 1200 बोरा चावल; अब तक किसी की जवाबदेही तय नहीं



अर्जुन झा –
जगदलपुर माड़वी हिड़मा जैसे खूंखार नक्सली आम आदिवासी की नजर में यूं ही हीरो नहीं बन जाते। इसके लिए जिम्मेदार होती है प्रशासनिक गड़बड़ियां, भ्रष्टाचार और गरीब आदिवासियों के हक पर डाका डालने की प्रवृत्ति। ऐसे नक्सली जब आदिवासियों के हक के लिए लड़ने की बात कहते हैं, तो भोले भाले आदिवासी उन्हें अपना जन नायक मान बैठते हैं। हम यहां नक्सली हरकतों की हिमायत नहीं कर रहे हैं, बल्कि सिस्टम की उस खामियों को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसने हजारों गरीब आदिवासियों के पेट पर लात मारी है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीब आदिवासी परिवारों के वितरण के लिए आए 12 सौ बोरा चावल, शक्कर, गुड़, चना आदि खाद्यान्न कालाबाजारी के फेर में सड़ गए। यह खाद्यान्न गरीबों तक नहीं पहुंचा और शासन को लाखों रुपयों का नुकसान भी हो गया। हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े अनाज घोटाले में अब तक किसी भी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकी है। उल्टे अधिकारी मामले पर पर्दा डालने के प्रयास में लगे हैं।
भ्रष्टाचार और कालाबाजारी का यह बड़ा मामला उसी सुकमा जिले का है, जो हाल ही में मारे गए मोस्ट वांटेड हार्ड कोर नक्सली हिड़मा का गृह जिला भी है। हिड़मा का मारा जाना निसंदेह सुरक्षा बलों की बड़ी कामयाबी है, मगर उसके बाद सोशल मीडिया पर हिड़मा को लेकर जो बातें चल रही हैं, उनके मुताबिक हिड़मा एक जन नायक था, उसने आदिवासी हित में और बस्तर के जल, जंगल एवं जमीन की रक्षा के लिए बंदूक उठाई थी। दिल्ली में भी हिड़मा के समर्थन में कुछ लोगों ने रैली निकाली थी। हिड़मा की जन्मभूमि और कर्मभूमि सुकमा जिले के चिंतलनार में कालाबाजरी के उद्देश्य से रखे गए गरीबों के हिस्से के 1200 बोरी चांवल, शक्कर, गुड़, चना, आदि खाद्यान्न सड़ गए। इतने बड़े मामले में प्रशासन ने संज्ञान तक नहीं लिया। चावल से बदबू आने की खबर जब ग्रामीणों द्वारा खाद्य विभाग तक पहुंचाई गई तो विभाग ने आनन फानन में गुणवत्ता की जांच के लिए सेंपल राजधानी भेजी। जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि गरीबों का चावल वह अब मानव उपयोग के लायक नहीं है।जिला प्रशासन अपनी लाज बचाने उक्त सड़े चावल को नीलाम कर सरकारी खजाने में कुछ राशि जमा कराने के जुगाड़ में लगा है। सड़े चावल को खरीदने वाला नहीं मिलने से विभाग द्वारा दोबारा निविदा बुलाए जाने की खबर है। इसे गोपनीय रखा गया है। सुकमा जिले के प्रभारी सचिव से लेकर 3 खाद्य सचिव मामले से अनजान हैं। सुकमा जिले के चिन्हांकित नियद नेल्लानार क्षेत्र के कई ग्रामीणों का हाल बेहाल है जहां चिन्हांकित परिवारों तक पर्याप्त राशन सामग्री नहीं पहुंच पा रही है। जिला खाद्य अधिकारी श्री कोमरे ने बताया कि सड़े हुए चावल नीलामी के लिए दूसरी बार निविदा बुलाई गई है। ज्ञातव्य हो कि राजधानी में बैठे मंत्री और अफसर सुकमा जिले में विकास का भले ही लाख दावा करें, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही है। जब तक दागी अधिकारी सुकमा जिले से नहीं खदेड़ें जाएंगे, तब तक सुकमा जिले के दुरस्थ अंचलों में विकास की बात बेमानी ही होगी। गरीबों के लिए बनाई गई खाद्यान योजना का शत प्रतिशत लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। खासतौर पर सुकमा जिले के कोंटा जनपद क्षेत्र के दर्जनों पंचायतों में, जहां
कालाबाजारी के लिए शासकीय गोदाम में रखा गया पीडीएस का 600 क्विंटल चावल ग्रामीणों को नसीब नहीं हो पाया और गोदाम में ही सड़ गया।

सक्रिय हैं चावल माफिया
घोर नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में चावल माफिया आज भी सक्रिय हैं। इनमें आश्रम- छात्रावासों के अधीक्षक, शिक्षक, आदिम जाति कल्याण विभाग के संयोजक, अधिकारी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों के सेल्समैन, खाद्य विभाग के अधिकारी तक शामिल हैं। इनके सहारे कमीशन का हिस्सा जिला लेवल तक पहुंचता है। यही कारण है कि 35 लाख रुपए से अधिक का खा‌द्यान्न चिंतलनार में सड़ गया लेकिन जिला प्रशासन इतने गंभीर मामले पर चुप्पी साधे बैठा है। यह जिला प्रशासन की उदासीनता और सिस्टम की नाकामी को दर्शाता है। खाद्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी जिनकी लापरवाही के चलते चावल बर्बाद हुआ है, उन्हे ही जांच के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करना प्रशासनिक सांठगांठ की ओर इशारा करता है।

दोबारा नीलामी की तैयारी
जिस खाद्य अधिकारी के निगाहबानी में चावल सड़ा है, उस पर जिला प्रशासन मेहरबान है। मेहरबानी ऐसी कि उन्हे नीलामी का नोडल अधिकारी बना दिया गया है। जो वर्तमान में सहायक खाद्य अधिकारी के पद पर सुकमा मे पदस्थ हैं। सड़े चावल के विक्रय के लिए पहली बार बुलाई गई निविदा में किसी ने भी खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई तो प्रशासन को दोबारा निविदा बुलानी पड़ी है। खबर है कि अब तक किसी ने खरीदने में रूचि नहीं ली है।

जिम्मेदार कौन, नहीं हुआ खुलासा
सुकमा जिला कलेक्टर द्वारा एक वर्ष से मामले की जांच कराई जा रही है, लेकिन अब तक यह साबित नहीं हो पाया है कि किसकी लापरवाही से 35 लाख का राशन खराब हुआ है। किसकी जिम्मेदारी तय होगी, कौन भरपाई करेगा? इस मामले पर भी कलेक्टर चुप्पी साध चुके हैं, कुछ भी बोलने से बचते आ रहे हैं। इस मामले पर खानापूर्ति कर औपचारिकता निभाई गई है। जिस गोदाम से चावल बरामद की गई थी, उसके विभाग को खाद्य विभाग द्वारा आज तक नोटिस तक जारी नहीं किया गया है। एक गोदाम वन विभाग का था दूसरा गोदाम शासकीय है, जिसका पता भी नहीं लगाया जा सका है।सरकार के मंत्री और अफसर हमेशा कहा करते हैं कि पीडीएस मामले पर लापरवाही करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन यह महज बयान तक सीमित है। 35 लाख का चावल सड़ने के मामले में खाद्य सचिव अनजान बने हुए हैं। जबकि जिला स्तर से मामले को लेकर संज्ञान में 3 माह पूर्व ही लाया जा चुका है। वहीं जब खाद्य मंत्री के संज्ञान में यह मामला लाया गया तो मंत्री दयालदास बघेल बोले कि दिखवाता हूं। अब पता नहीं कब तक दिखवा पाते हैं। मंत्री भी अफसरों की तरह गोल-मोल जवाब देकर अपना पल्ला झाड़ने में लगे हैं।

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