काम के भारी बोझ तले दबे पंचायत सचिव; बंधुआ मजदूर की तरह कराया जा रहा है काम



अर्जुन झा-
बकावंड। साय सरकार के सुशासन के दौर में ग्राम पंचायतों के सचिवों से इन दिनों बंधुआ मजदूरों की तरह काम कराया जा रहा है। काम के बोझ तले सचिव इस कदर दबे हुए हैं कि उनकी कराह तक नहीं निकल पा रही है। सचिव चैन की नींद भी नहीं ले पा रहे हैं। धान का अवैध परिवहन रोकने उनकी ड्यूटी लगाई गई है, जिसमें उन्हें रतजगा करना पड़ रहा है। इस ड्यूटी से लौटते ही सुबह से पंचायत के कामकाज में लग जाना पड़ता है।
केंद्र और राज्य सरकारों की तमाम योजनाओं का क्रियान्वयन कराने में पंचायत सचिव की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। आजकल रात्रि 10 से सुबह छह बजे तक धान के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए कलेक्टर के आदेश पर उनकी ड्यूटी नाकों पर लगाई गई है। इसके बाद सुबह 10 बजे से उन्हें एसआईआर के काम में लगना पड़ता है।आधार अपग्रेडेशन, अपार आईडी के लिए जन्म प्रमाण पत्र बनाने, आयुष्मान कार्ड बनाने, वय वंदन कार्ड प्रक्रिया, प्रधानमंत्री
आवास निर्माण पर नजर रखने और पंचायत के सारे काम सचिवों को निपटाने पड़ते हैं। पूरी रात ड्यूटी करते करते थक चुके सचिव पल भर भी आराम नहीं कर पाते। घर परिवार से एक तरह उनका नाता ही टूट गया है। वे अपने बीबी बच्चों को भी समय नहीं दे पा रहे हैं।
सचिवों की ड्यूटी अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के संपादन में लगती ही है। मानवीय दृष्टिकोण और मानवाधिकार को ताक पर रख कर जिला प्रशासन इनसे बंधुआ मजदूरों की तरह काम करवा रहा है। काम के बोझ से परेशान देशभर में कई बीएलओ आत्महत्या कर चुके हैं। अगर सचिवों पर काम का बोझ ऐसा ही बना रहा, तो संभव है बकावंड विकासखंड में भी ऎसी ही घटनाएं होने लगें। बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड के सचिवों पर काम का बोझ इसलिए बढ़ गया है कि विकासखंड के गांव ओड़िशा की सीमा से लगे हुए हैं। धान खरीदी सीजन में ओड़िशा से धान लाकर यहां के खरीदी केंद्रों में खपाया जाता है। इसकी रोकथाम के लिए स्वयं बकावंड एसडीएम भी रात रात भर सीमावर्ती गांवों का दौरा करते हुए धान के अवैध परिवहन के मामले पकड़ रहे हैं। मगर सचिव मैदानी कर्मचारी होते हैं, इसलिए उन पर काम का बोझ वैसे भी ज्यादा रहता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *