जामड़ी पाटेश्वर धाम के खिलाफ हजारों आदिवासियों ने भरी हुंकार, घेरा कलेक्ट्रेट



-अर्जुन झा-
दल्ली राजहरा। बालोद जिले की डौंडीलोहारा तहसील में जंगलों के बीच स्थित जामड़ी पाटेश्वर धाम और उसके संस्थापक बाल योगेश्वर श्रीराम बालक दास महात्यागी के खिलाफ हजारों आदिवासियों ने हुंकार भरी है। आदिवासियों का सैलाब बालोद कलेक्ट्रेट में उमड़ पड़ा। आदिवासी समाज का आरोप है कि संरक्षित वन भूमि पर कब्जा कर लिया गया है और आदिवासियों के आस्था के केंद्र जल कैना को भी तहस नहस कर दिया गया है। इन मुद्दों को लेकर हजारों आदिवासियों ने कलेक्ट्रेट का घेराव भी किया था और ज्ञापन सौंपा।
सर्व आदिवासी समाज की बालोद जिला इकाई द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि बालोद जिले की डौंडीलोहारा तहसील एवं वन परिक्षेत्र डौंडीलोहारा अंतर्गत मंगचुआ थाना क्षेत्र के ग्राम तुएगोंदी में विगत कई वर्षों से जामड़ी पाटेश्वर धाम संचालित है। इसके संस्थापक बाल योगेश्वर राम बालकदास महात्यागी द्वारा संविधान, वन कानून, आदिवासी अधिकार एवं प्रशासनिक नियमों को खुलेआम चुनौती देते हुए संरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा, अवैध निर्माण तथा आदिवासी समाज की भावनाओं को कुचलने का कार्य किया जा रहा है।शासन प्रशासन के विभिन्न विभागों द्वारा समय-समय पर अवैध कब्जा एवं निर्माण को स्वीकार किए जाने, दस्तावेजों में उल्लेख होने तथा शिकायतें प्रस्तुत किए जाने के बावजूद आज तक प्रभावी कानूनी कार्रवाई नहीं की गई है। इससे आदिवासी समाज में भारी रोष, पीड़ा एवं प्रशासन के प्रति अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हो रही है।आदिवासी समाज का कहना है कि जब जल, जंगल और जमीन की रक्षा हेतु आदिवासी समाज ने सदियों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी, तब आज उसी समाज की आस्था, संस्कृति और अधिकारों को कुचलते हुए यदि कोई व्यक्ति संरक्षित वन भूमि पर कब्जा कर कानून से ऊपर बनने का प्रयास करे और प्रशासन मूकदर्शक बना रहे, तो यह केवल कानून का अपमान नहीं बल्कि संविधान की आत्मा पर भी प्रहार है। आगे बताया गया है कि 24 नवंबर 2020 को वन मंडलाधिकारी बालोद द्वारा पत्र क्रमांक 645 के माध्यम से जिला प्रशासन को अवगत कराया गया था कि लोहारा परिक्षेत्र के लमती परिसर स्थित संरक्षित वन कक्ष क्रमांक 304 में अनधिकृत निर्माण एवं अतिक्रमण किया गया है। इस पत्र में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को भी संरक्षित वन भूमि पर निर्माण कराने हेतु दोषी माना गया था। जब स्वयं वन विभाग ने संरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण स्वीकार किया है, तब प्रश्न यह उठता है कि आज तक जिला प्रशासन बालोद द्वारा दोषियों पर क्या कार्रवाई की गई? यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो आखिर किसके संरक्षण में यह अवैध कब्जा फल-फूल रहा है? ग्राम पंचायत तुमड़ीकसा की वन अधिकार समिति तुएगोंदी द्वारा 11 अक्टूबर 2021 को सामुदायिक वन अधिकार हेतु 134 पृष्ठों का दावा आवेदन प्रस्तुत किया गया था। संबंधित अधिकारियों द्वारा परीक्षण एवं अभिमत प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए थे, किंतु आज तक ग्रामवासियों को वनाधिकार पट्टे प्रदान नहीं किए गए हैं। जब आदिवासी ग्रामीणों को उनके वैधानिक वन अधिकार नहीं दिए जा रहे हैं, तब उसी भूमि पर करोड़ों रुपये की सरकारी राशि खर्च कर निर्माण कार्य किसके हित में कराया गया? क्या शासन की योजनाएं आदिवासी समाज के अधिकारों को कुचलने और अवैध कब्जों को वैधता देने के लिए संचालित की जा रही हैं? जामड़ी पाटेश्वर धाम के संचालक बाल योगेश्वर श्रीराम बालक दास महात्यागी के विरुद्ध आदिवासी समाज से जुड़े मामलों में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध पंजीबद्ध होने के बावजूद आज तक कोई कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। आदिवासी समाज ने सवाल किया है कि क्या एक सामान्य आदिवासी नागरिक के लिए कानून अलग और प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए अलग है?

प्रशासनिक आदेश का उल्लंघन
समाज के मुताबिक 3 जून 2019 को प्रशासन द्वारा संरक्षित वन क्षेत्र में चल रहे अवैध निर्माण कार्य से संबंधित सामग्रियों को जप्त किया गया था तथा आगे निर्माण कार्य नहीं करने की स्पष्ट चेतावनी भी दी गई थी। इसके बावजूद लगातार निर्माण कार्य जारी रहा। प्रशासनिक आदेशों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है और प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित है। यह कानून व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। तुएगोंदी के संरक्षित वन क्षेत्र में स्थित आदिवासी समाज की आस्था के प्रमुख केंद्र “जल कैना” को बुरी तरह क्षतिग्रस्त एवं तहस-नहस कर दिया गया है। यह केवल एक स्थल नहीं बल्कि आदिवासी समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है। आदिवासी समाज की आस्था पर इस प्रकार का हमला पूरे समाज की भावनाओं को आहत करने वाला कृत्य है। इसके बावजूद प्रशासनिक चुप्पी समाज में गहरा असंतोष पैदा कर रही है। आगे कहा गया है कि वन विभाग बालोद द्वारा स्वयं भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 33(1) (ग) के अंतर्गत संरक्षित वन क्षेत्र लमती में जबरन कब्जा करने का आरोप लगाया गया है। जब विभागीय दस्तावेजों में अपराध दर्ज है, तब आज तक विधिसम्मत कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यदि कानून केवल गरीबों और कमजोरों पर लागू होगा तथा प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलेगा, तो लोकतंत्र और संविधान की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट उत्पन्न होगा।

आदिवासी समाज की मांगें
सर्व आदिवासी समाज ने संरक्षित वन भूमि पर हुए समस्त अवैध कब्जों एवं निर्माण कार्यों की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराने, बाल योगेश्वर श्रीराम बालक दास महात्यागी के विरुद्ध वन अधिनियम, एससी- एसटी एक्ट एवं अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत तत्काल कठोर कानूनी कार्रवाई करने, ग्राम तुएगोंदी के आदिवासी ग्रामीणों को लंबित सामुदायिक वन अधिकार पट्टा तत्काल प्रदान करने, आदिवासी समाज के आस्था स्थल “जल कैना” को पूर्व स्थिति में संरक्षित एवं पुनर्स्थापित कराने, संरक्षित वन क्षेत्र में भविष्य में किसी भी प्रकार के अवैध निर्माण एवं अतिक्रमण पर तत्काल रोक लगाने और पूरे प्रकरण की न्यायिक अथवा उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच कर दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग उठाई है। ऐसा न होने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी आदिवासी समाज ने दी है।

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