बंदूक छोड़ कलम को अपनी ताकत बनाई आत्मसमर्पित नक्सली अर्जुन ने



–अर्जुन झा-
जगदलपुर। भारत भूमि अनादि काल से सदमार्ग पर चलने और पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देने वाली भूमि रही है। यहां एक खूंखार डाकू वाल्मीकि का ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ कि महर्षि का दर्जा प्राप्त करने में सफल हो गए। रामायण ग्रंथ की रचना कर महर्षि वाल्मीकि कालजयी हो गए। ये तो थी त्रेतायुग की बात, कलयुग में भी अब ऎसी गाथाएं घटित होने लगी हैं। जो नक्सली कभी बंदूक को अपनी ताकत समझता था और उसके दम पर आतंक मचाता था, आज उसी नक्सली ने बंदूक छोड़ कलम को अपनी ताकत बना लिया है। आईए आपको सुनाते हैं कलयुग के इस वाल्मीकि की गाथा
कलयुग के इस वाल्मीकि का नाम है अर्जुन। द्वापर युग के अर्जुन का निशाना अचूक था, वैसे ही कलयुग के इस अर्जुन की बंदूक की गोली भी हमेशा निशाने को हिट करती थी, मगर आज के बदल चुके अर्जुन की कलम भी कम पैनी नहीं है। बंदूक छोड़ कलम पकड़ने की चाहत और दृढ़ इच्छाशक्ति ने अर्जुन को “शिक्षा वीर” बना दिया है। आज के इस अर्जुन का पूरा नाम है अर्जुन ओयाम। केंद्र और राज्य की सरकारों की नीतियों एवं योजनाओं से प्रभावित होकर नक्सली अर्जुन ने समाज की मुख्यधारा से जुड़ने का फैसला किया और बस्तर संभाग के बीजापुर जिले में उसने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद तो अर्जुन ने तमाम कठिन परिस्थितियों को पीछे छोड़ते हुए पुनर्वास केंद्र में रहकर पढ़ाई शुरू कर दी। उसने 10वीं बोर्ड की परीक्षा दी और 500 में 335 अंक प्राप्त कर प्रथम श्रेणी से परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। अर्जुन की इस दृढ़ इच्छाशक्ति को बल और हौसला दिया पुलिस के बड़े अधिकारियों ने। पुलिस के अफसर लगातार अर्जुन का मनोबल बढ़ाते रहे। परीक्षा के लिए आवश्यक पुस्तकें और संसाधन उसे उपलब्ध कराए। परीक्षा के फार्म भरने से लेकर उनकी परीक्षा की तैयारी में सहायक बने। अर्जुन ओयाम वर्ष 2010 में माओवादी संगठन में शामिल हुआ था, लेकिन संगठन में रहते हुए भी उसने पढ़ाई जारी रखने की अपनी इच्छा को कभी समाप्त नहीं होने दिया। अक्टूबर 25 में 210 सशस्त्र माओवादियों के साथ जगदलपुर में आत्मसमर्पण करने के बाद अर्जुन ने अपने जीवन की नई शुरुआत शिक्षा के माध्यम से करने का संकल्प लिया। समर्पण के बाद अर्जुन ने 10वीं की परीक्षा की तैयारी की और अपने 7 अन्य साथियों के साथ 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। यह उपलब्धि उसके दृढ़ संकल्प, मेहनत और बदलते जीवन की प्रेरणादायक मिसाल है। बीजापुर एसपी उमेश प्रसाद यादव ने अर्जुन की इस उपलब्धि के लिए उसे बधाई दी और आगे की पढ़ाई के लिए आवश्यक मदद उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया।

अब ये है अर्जुन का लक्ष्य
अब अर्जुन का लक्ष्य 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर अपने गांव तोड़का में शिक्षादूत के रूप में कार्य करना है। वह गांव के बच्चों को शिक्षा से जोड़कर उनके जीवन में ज्ञान का उजियारा फैलाना चाहता है। अर्जुन का सपना है कि गांव के बच्चे पढ़ें, आगे बढ़ें और शिक्षा के माध्यम से गांव एवं पूरे क्षेत्र के विकास की नई कहानी लिखें। पुनर्वासित नक्सली अर्जुन ओयाम का कहना है- “बंदूक से नहीं, शिक्षा के उजियारे से बदलेगा गांव का भविष्य।”

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