दशकों तक खून से लथपथ रहे बस्तर में अमन और तरक्की की पुरसुकून बयार



–अर्जुन झा-
जगदलपुर। थम गए बारूदी धमाके और बंदूकों की तड़तड़ाहट। खून से लथपथ होती आ रही धरती पर अब गूंजने लगे हैं हल्बी, भतरी, गोंडी लोकगीतों के तराने। बाघ, तेंदुए निकल आए हैं अपनी मांदों से, गूंजने लगी है चिड़ियों की चहचहाहट। गोंड़, हल्बा, मुरिया और भतरा भतरी आदिवासी बेखौफ होकर कंद मूल, पान, पत्ते तेंदू, महुआ, चार, सल्फी बटोरने लगे हैं जंगलों में। चारों तरफ अमन की बयार बह रही है। उबड़ खाबड़ पथरीली पगडंडियों की जगह पक्की सड़कों ने ले ली है। स्कूलों में फिर से बच्चों की धींगा मस्ती दिखाई देने लगी है। ये है छत्तीसगढ़ के बदलते बस्तर की असल तस्वीर और इस खूबसूरत तस्वीर में रंग भरने का काम किया है बस्तर के माटी पुत्र, आदिवासी नेता एवं राज्य सरकार में वरिष्ठ मंत्री केदार कश्यप ने। आज सचमुच बस्तर में केदार की तपस्या फलीभूत होती दिख रही है।


बस्तर को लंबे समय तक देश के सबसे चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता रहा। नक्सली हिंसा ने यहां केवल सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं को प्रभावित कर रखा था, बल्कि लोगों के रोजमर्रा के जीवन और मनोविज्ञान पर भी गहरी छाप छोड़ी थी। गांवों में सूरज ढलने के साथ जीवन का सिमट जाना, बच्चों की शिक्षा का बाधित होना, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का कठिन होना और रोजगार के सीमित अवसर इस संघर्ष की मानवीय कीमत रहे हैं। यह तस्वीर किसी दूर बैठे आकलन की नहीं, बल्कि बस्तर के दूरस्थ और लंबे समय तक नक्सल प्रभावित रहे इलाकों में किए गए मैदानी अनुभवों पर आधारित है। इन क्षेत्रों की यात्राओं के दौरान ग्रामीण परिवारों के बीच समय बिताने, उनके घरों में जाकर बातचीत करने, खेतों और गांवों की परिस्थितियों को करीब से देखने तथा स्कूल, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क, मोबाइल नेटवर्क और सरकारी सेवाओं की जमीनी स्थिति को समझने का अवसर मिला। बस्तर संभाग के सुकमा जिले के धुर नक्सल प्रभावित रहे जगरगुंडा, चिंतलनार, पुवर्ती, उसूर,आवापल्ली सहित दक्षिण बस्तर के कई आंतरिक इलाकों में लोगों से हुई बातचीत और प्रत्यक्ष अनुभवों में एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसमें बदलाव और चुनौतियां दोनों साथ दिखाई देते हैं। अब बस्तर के कई सुदूर इलाकों में तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर के दूरस्थ इलाकों जैसे जगरगुंडा, चिंतलनार और पुवर्ती से लेकर उसूर–आवापल्ली तक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्कूल, आंगनबाड़ी, खेल और आजीविका जैसी गतिविधियां उन क्षेत्रों तक पहुंच रही हैं, जहां कभी सरकारी उपस्थिति स्वयं एक चुनौती थी। यह बदलाव अभी पूर्ण नहीं है। दशकों तक हिंसा के वातावरण में रहने वाले समाज के मन से भय की स्मृतियां एक दिन में समाप्त नहीं हो सकतीं। फिर भी सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि बस्तर का ग्रामीण समाज अब धीरे-धीरे भय के बीच जीवन जीने से आगे बढ़कर अपने भविष्य की कल्पना करने लगा है।जगरगुंडा से चिंतलनार और आगे उसूर- आवापल्ली तक यात्रा करने पर यह मानसिक बदलाव सबसे पहले लोगों के व्यवहार में दिखाई देता है। दिन निकलने के साथ ग्रामीण अपने खेतों, बाजारों, स्कूलों और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए गांव के भीतर और बाहर अपेक्षाकृत निर्भीक होकर आते-जाते दिखाई देते हैं। सरकार और प्रशासन के प्रति लोगों का जुड़ाव भी पहले की तुलना में बढ़ता हुआ महसूस होता है

अब भी जारी है एहतियात
हालांकि दिन ढलने के बाद स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। कई गांवों में लोग जल्दी अपने घरों को लौटना पसंद करते हैं और रात के समय अनावश्यक आवाजाही से बचते हैं। यही बस्तर के वर्तमान संक्रमण की वास्तविक तस्वीर है। दिन में बढ़ता आत्मविश्वास और रात में बची हुई सावधानी। स्थायी शांति की अगली कसौटी यही होगी कि सुरक्षा की यह भावना धीरे-धीरे ग्रामीणों के मन में स्थायी विश्वास में बदल सके। इस बदलाव का सबसे दिखाई देने वाला रूप सड़क और संचार के क्षेत्र में सामने आया है। पुवर्ती, रायगुड़ा, गलगम और दुगलमगुड़ा जैसे सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों तक प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से पक्की सड़कें पहुंचना केवल एक बुनियादी सुविधा का विस्तार नहीं है। यह उन इलाकों तक राज्य की पहुंच का प्रतीक भी है, जहां कभी पहुंचना ही एक बड़ी चुनौती माना जाता था।

डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ाने की दरकार
दूरसंचार के क्षेत्र में भी बदलाव दिखाई देता है। भोपालपट्टनम क्षेत्र के कुछ गांवों में जून 2026 में नए मोबाइल टावर लगाए गए। हालांकि नेटवर्क की स्थिति अभी भी समान नहीं है। कई दूरस्थ क्षेत्रों में मुख्यतः जीओ या बीएसएनएल का नेटवर्क ही उपलब्ध है और घाटी वाले क्षेत्रों में सिग्नल कमजोर पड़ जाता है। ऐसे क्षेत्रों के लिए केवल टावर लगाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि निरंतर और भरोसेमंद डिजिटल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना अगली प्राथमिकता होनी चाहिए।

पुल-रपटों का निर्माण जरूरी
यातायात के क्षेत्र में भी धीरे-धीरे बदलाव आया है। आंतरिक गांवों में मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा की उपस्थिति दिखाई देती है, लेकिन बसों की संख्या अभी सीमित है। दूसरी ओर निजी बसों का अपेक्षाकृत अधिक किराया निम्न आय वाले ग्रामीण परिवारों की आवाजाही को प्रभावित करता है और उनकी सीमित आय में से परिवहन पर होने वाला खर्च बढ़ाता है। मानसून बस्तर की इस चुनौती को और गंभीर बना देता है। नदी-नालों के उफान पर आने से कई प्रमुख मार्ग अस्थायी रूप से बाधित होते हैं और दूरस्थ गांव फिर से जिला और संभागीय मुख्यालयों तथा बड़े बाजारों से कटने लगते हैं। इसलिए बस्तर में अगली चुनौती केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि बारहमासी कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना है। सड़क और संचार के साथ ऊर्जा की पहुंच भी दूरस्थ बस्तर के जीवन में धीरे-धीरे उजाला ला रही है। दूरस्थ क्षेत्रों के जनजातीय परिवारों के घरों, खेतों और सड़कों पर सीमित ही सही, लेकिन सोलर पैनल आधारित बिजली आपूर्ति दिखाई देना एक महत्वपूर्ण बदलाव है। जहां कभी अंधेरा दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था, वहां सौर ऊर्जा की छोटी-छोटी रोशनियां केवल बिजली की सुविधा नहीं, बल्कि जीवन में बदलती संभावनाओं का संकेत देती हैं। घरों में रोशनी से बच्चों के पढ़ने का समय बढ़ता है, खेतों में ऊर्जा की उपलब्धता उपयोगी गतिविधियों को संभव बनाती है और सड़कों पर रोशनी आवागमन में सुरक्षा की भावना को मजबूत करती है। इन दूरस्थ जनजातीय परिवारों के जीवन में सोलर ऊर्जा की यह पहुंच भले अभी सीमित हो, लेकिन यह उस बड़े परिवर्तन की शुरुआत है जिसमें विकास का प्रकाश धीरे-धीरे उन बस्तियों तक पहुंच रहा है, जो लंबे समय तक अंधकार और अलगाव से घिरी रही थीं।

प्रशासन की सेवाएं घर तक
बस्तर में बदलाव केवल सड़क, स्कूल और मोबाइल नेटवर्क तक सीमित नहीं है। नक्सल प्रभावित आंतरिक क्षेत्रों में प्रशासन और जनसेवा की प्रत्यक्ष उपस्थिति भी अब ग्रामीण जीवन का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है। शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा जन सेवा केंद्र का ग्रामीण परिवारों के लिए त्वरित सेवा केंद्र के रूप में उपलब्ध होना इसी बदलाव का महत्वपूर्ण उदाहरण है। जिन इलाकों में कभी सरकारी सेवाओं तक पहुंच स्वयं एक चुनौती हुआ करती थी, वहां स्थानीय स्तर पर आवश्यक सेवाओं और सहायता के लिए सुलभ केंद्र मिलना राज्य और ग्रामीण समाज के बीच बढ़ते संपर्क को दर्शाता है।ऐसे सेवा केंद्रों का महत्व केवल उपलब्ध कराई जा रही किसी एक सेवा तक सीमित नहीं है। दूरस्थ जनजातीय परिवार के लिए गांव या घर के आसपास उपलब्ध कोई त्वरित सेवा केंद्र समय, यात्रा-व्यय और अनिश्चितता को कम करता है। इससे ग्रामीणों में यह भरोसा भी मजबूत होता है कि शासन की व्यवस्था केवल जिला मुख्यालय या बड़े कस्बों तक सीमित नहीं, बल्कि उनके गांवों और उनके निकट भी मौजूद है।

कुपोषण है बड़ी चुनौती
स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में भी सरकारी सेवाओं की पहुंच अब उन इलाकों तक बढ़ रही है, जहां पहले इनकी निरंतर उपलब्धता कठिन थी। दक्षिण बस्तर के कई हिस्सों में कुपोषण और हिडेन हंगर की चुनौती अभी भी दिखाई देती है। विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं में पोषण की कमी को दूर करना एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। हालांकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से अब दूरस्थ परिवारों तक खाद्यान्न की पहुंच पहले की तुलना में बेहतर हो गई है। अनेक आंगनबाड़ी केंद्रों में ग्रामीण महिलाएं अपने छोटे बच्चों को लेकर नियमित पहुंच रही हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा बच्चों को पोषण सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन दूसरी ओर भवनों की स्थिति और मानसून से जुड़ी समस्याएं भी सामने आती हैं। कई केंद्रों के आसपास जलभराव और भवनों की छत से पानी टपकने जैसी समस्याएं दिखाई देती हैं। मिट्टीमरका जैसे दूरस्थ गांव में आंगनबाड़ी केंद्र की सक्रिय उपस्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल पोषण केंद्र नहीं, बल्कि राज्य और ग्रामीण परिवार के बीच सामाजिक संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है।

फिर से जल उठी शिक्षा की मशाल
शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव शायद बस्तर के भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेत है। कुआकोंडा, कोंटा, गंगालूर, उसूर, कुटरू और ओरछा जैसे लंबे समय तक नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्रों में अब स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थिति और शिक्षकों द्वारा अपेक्षाकृत निर्भीक होकर शिक्षण कार्य करना दिखाई देता है। जगरगुंडा में प्रस्तावित एजुकेशन सिटी को लेकर ग्रामीण परिवारों में सकारात्मक अपेक्षा है। दूसरी ओर जावंगा एजुकेशन सिटी से निकलकर राज्य स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों ने यह साबित किया है कि बस्तर के बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं है; उन्हें केवल अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की जरूरत है। बस्तर के गांवों में बच्चों के सपने भी बदल रहे हैं। वे अब केवल अपने गांव या आसपास के क्षेत्रों में रोजगार की कल्पना नहीं करते, बल्कि उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी सेवाओं में जाने की इच्छा भी रखते हैं। ऐसे में स्कूल तक सड़क पहुंचाना पहला कदम है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के माध्यम से उस रास्ते को बेहतर भविष्य तक पहुंचाना अगली चुनौती है।

खेलों में बड़ी धमक
बस्तर के युवाओं में यह बदलाव खेल के मैदानों में भी दिखाई देता है। जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक हिंसा का वातावरण रहा, वहां आज सुबह के समय किशोर और युवा सड़कों तथा मैदानों में दौड़ते दिखाई देते हैं। यह सामान्य दृश्य लग सकता है, लेकिन बस्तर की परिस्थितियों को देखते हुए यह सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेत है। बस्तर ओलंपिक ने इस ऊर्जा को एक व्यापक मंच दिया है। बस्तरिहा बटालियन और बस्तर फाइटर्स में भर्ती के अवसरों ने भी स्थानीय युवाओं के सामने सुरक्षा सेवाओं में रोजगार और सम्मानजनक करियर का एक रास्ता खोला है। जिस युवा शक्ति को कभी हिंसा प्रभावित वातावरण ने सीमित किया था, उसे अब खेल, शिक्षा और रोजगार की दिशा में मोड़ने की संभावना बन रही है।

लौट आए अपनी धरती पर
आजीविका के मोर्चे पर भी नक्सल-मुक्ति के बाद एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। हिंसा के कारण अपने पैतृक गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर चले गए कुछ परिवार अब अपने गांवों में वापस लौट रहे हैं। सांड्रा जैसे सुदूर गांवों में ऐसे परिवार दिखाई देते हैं जो अपने पूर्वजों की जमीन पर लौटकर कृषि और वन उपज के माध्यम से जीवन फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन केवल गांव में वापस लौटना पर्याप्त नहीं है। परिवार तभी स्थायी रूप से टिकेंगे जब उनके पास पर्याप्त और विविध आय के स्रोत होंगे। पारंपरिक एकल फसल आधारित कृषि से जनजातीय परिवारों की आय लंबे समय तक सीमित रही है। अब सब्जी उत्पादन, बागवानी और अन्य कृषि गतिविधियों के साथ आय के विविधीकरण की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। वन विभाग के सहयोग से कुछ क्षेत्रों में काजू जैसी फसलों को बढ़ावा देने की दिशा में भी प्रयास हो रहे हैं। आजीविका के नए अवसरों के साथ बस्तर में पर्यटन भी जनजातीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन सकता है। कांगेर वैली नेशनल पार्क क्षेत्र में स्थानीय जनजातीय परिवारों द्वारा होम स्टे की सुविधा शुरू करने की पहल इसका एक सकारात्मक उदाहरण है। इससे एक ओर क्षेत्र में पर्यटन के विकास और स्थानीय परिवारों के लिए आय के नए अवसर पैदा होने की संभावना है, तो दूसरी ओर बाहर से आने वाले पर्यटकों को जनजातीय जीवन, स्थानीय खान-पान, परंपराओं और संस्कृति को करीब से समझने का अवसर मिलता है। यदि इसे स्थानीय समुदाय की भागीदारी, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक गरिमा के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो बस्तर में पर्यटन केवल घूमने की गतिविधि न रहकर जनजातीय समुदायों के लिए एक टिकाऊ आजीविका मॉडल बन सकता है। बस्तर में स्थायी आर्थिक पुनर्वास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें एक परिवार केवल एक फसल पर निर्भर न रहे, बल्कि कृषि, वनोपज, बागवानी, पशुपालन, हस्तशिल्प, पर्यटन और स्थानीय प्रसंस्करण जैसे कई आय-स्रोतों से जुड़ सके। इसमें वन एवं सहकारिता मंत्री केदार कश्यप ने अहम भूमिका निभाई है। इस परिवर्तन की सबसे गहरी तस्वीर शायद बस्तर के सांस्कृतिक और सार्वजनिक जीवन में दिखाई देती है। लंबे समय तक हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सार्वजनिक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय गतिविधियों का स्वतंत्र रूप से आयोजन अपने आप में बड़ा बदलाव है। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर जनजातीय युवाओं और युवतियों की व्यापक भागीदारी तथा लोक-सांस्कृतिक प्रस्तुतियां बताती हैं कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान अब नए आत्मविश्वास के साथ सार्वजनिक जीवन में लौट रही है।

पहली बार देखी तिरंगे की शान
इसी बदलाव का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक तिरंगा बना है। स्वतंत्रता के 80 वर्षों बाद पहली बार बस्तर संभाग की 92 ग्राम पंचायतों में तिरंगा ध्वज फहराया गया। यह केवल ध्वजारोहण का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन क्षेत्रों में राष्ट्रीय चेतना और नागरिक सहभागिता की नई अभिव्यक्ति थी, जहां लंबे समय तक हिंसा और भय के कारण सार्वजनिक गतिविधियां सीमित रही थीं। बीजापुर के सुदूर इंद्रावती नदी के तटवर्ती गांवों में निकाली गई तिरंगा यात्रा ने इस बदलाव को और जीवंत रूप दिया। दूरस्थ जनजातीय अंचल में ग्रामीणों और युवाओं की भागीदारी के साथ तिरंगे का गांवों तक पहुंचना इस बात का प्रतीक है कि राष्ट्रीय पहचान अब केवल शहरों और जिला मुख्यालयों तक सीमित नहीं रह गई है। वह बस्तर के सुदूर गांवों के सार्वजनिक जीवन में भी अपनी जगह बना रही है।

सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण
इसी क्रम में कुछ गांवों में ग्रामसभाओं द्वारा बाहरी धार्मिक प्रचार-प्रसार को लेकर सार्वजनिक रूप से अपने निर्णय दर्ज किए जाने की घटनाएं भी सामने आती हैं। इन्हें स्थानीय जनजातीय समुदाय द्वारा अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक स्वायत्तता को लेकर व्यक्त किए जा रहे आग्रह के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे मामलों में लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान महत्वपूर्ण है, ताकि ग्रामसभा के अधिकार, प्रत्येक नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता और समुदाय की सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन बना रहे। बस्तर की कहानी इसलिए केवल नक्सलवाद के कमजोर पड़ने की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक परिवर्तन की कहानी है जिसमें सड़क के साथ स्कूल पहुंच रहा है, स्कूल के साथ शिक्षक का भरोसा लौट रहा है, आंगनबाड़ी के साथ मां और बच्चे सरकारी व्यवस्था से जुड़ रहे हैं, मोबाइल टावर के साथ बाहरी दुनिया से संपर्क बढ़ रहा है, सौर ऊर्जा अंधेरे घरों और रास्तों तक रोशनी पहुंचा रही है, जन सेवा केंद्र के माध्यम से प्रशासनिक सेवाएं ग्रामीणों के करीब आ रही हैं, खेल के मैदान में युवा अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं, पर्यटन के माध्यम से जनजातीय परिवारों के लिए नए अवसर बन रहे हैं और गांवों में तिरंगा सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन रहा है।

लाभार्थी नहीं, बनाना होगा मालिक
बस्तर का आने वाला दशक केवल नक्सल-मुक्ति की उपलब्धि को बनाए रखने का नहीं, बल्कि शांति को विकास, विकास को अवसर और अवसर को आत्मनिर्भरता में बदलने का दशक होना चाहिए। आने वाले वर्षों में यदि मजबूत कनेक्टिविटी के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य एवं पोषण, विश्वसनीय ऊर्जा और डिजिटल नेटवर्क, आधुनिक कृषि एवं वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था, जनजातीय पर्यटन, खेल और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों को एकीकृत रूप से आगे बढ़ाया जाता है, तो बस्तर देश के सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक से उभरकर जनजातीय विकास, प्रकृति-आधारित अर्थव्यवस्था और समावेशी शांति का एक विशिष्ट मॉडल बन सकता है। आज जिन सुदूर गांवों में सड़क, सोलर रोशनी, मोबाइल नेटवर्क, स्कूल, जनसेवा केंद्र और होम स्टे जैसी छोटी-छोटी पहलें दिखाई दे रही हैं, वही भविष्य के बड़े परिवर्तन की आधारशिला बन सकती हैं। बस्तर का भविष्य इसलिए केवल इस बात में नहीं है कि यहां भय समाप्त हो, बल्कि इस बात में है कि यहां का बच्चा बेहतर शिक्षा पाए, युवा अपने गांव में अवसर देखे, परिवार अपनी जमीन और संस्कृति के साथ सम्मानजनक आय अर्जित करे और जनजातीय समाज विकास की प्रक्रिया का केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसका मुख्य भागीदार और निर्माता बने।

कमतर नहीं है केदार कश्यप की भूमिका
बस्तर संभाग में केंद्र और राज्य सरकार की जनहितैषी योजनाओं के सफल क्रियान्वन में बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता और छत्तीसगढ़ सरकार के वन, सहकारिता एवं जल संसाधन मंत्री मंत्री केदार कश्यप की बड़ी है। बस्तर को नक्सलमुक्त कराने, स्थानीय आदिवासियों को माओवाद के खिलाफ जागरूक बनाने में भी केदार कश्यप लगातार सक्रिय रहे हैं। नक्सलवाद से ग्रसित रहने के दौरान और नक्सल मुक्ति के बाद भी केदार कश्यप बस्तर के सुदूर कोंटा इलाके से लेकर अबूझमाड़ तक निरंतर दौरा करते आए हैं। जो आदिवासी भाजपा से छिटक चुके थे, उन्हें फिर भाजपा से जोड़ने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। यही वजह है कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा ने पूरे बस्तर संभाग में ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई है। अगर बस्तर में पुनः बीजेपी को एकतरफा विजय दिलानी है तो केदार कश्यप को पूरी जिम्मेदारी देकर बस्तर के विकास की योजना तैयार करनी होगी। इसके पीछे ठोस वजह यह है कि केदार कश्यप यहां की संस्कृति, परंपारा, हर बोली भाषा, खान पान, रहन सहन, स्थानीय लोगों की तासीर और भौगोलिक परिस्थिति से भलिभांति परिचित हैं। बस्तर के आदिवासियों के बीच कश्यप परिवार की गहरी पैठ तबसे है जब इस परिवार के मुखिया रहे दिवंगत वरिष्ठ आदिवासी नेता एवं पूर्व सांसद बलिराम कश्यप ने बस्तर में भाजपा के लिए जमीन तैयार की थी।

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