नक्सल पीड़ित शिक्षक को बनाया गया संवेदनशील क्षेत्र के आवासीय विद्यालय का अधीक्षक, शिक्षक के जान को हो सकता है खतरा

भोपालपटनम(जरखांन):- बालक आवासीय छात्रावास में नियुक्त नक्सल पीड़ित को अधीक्षक बनाना प्रशासन और शासन के लिए ” गले की हड्डी ” ना बन जाए । नव नियुक्त अधीक्षक को लेकर नगर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजीव गांधी मिशन द्वारा संचालित बालक आवासीय छात्रावास ( पोटाकेबीन) सन्दरापल्ली में तत्कालीन अधीक्षक कैलाशपति जंगम के असामयिक निधन के बाद रिक्त था । इस पद के लिए लगभग 65 शिक्षक दावेदार थे किन्तु इन सबके बीच नक्सल पीड़ित जयहिंद लाटकर को अधीक्षक बनाया गया जो कि खास चर्चा का कारण बना ।

नव नियुक्त अधीक्षक जयहिंद लाटकर नक्सल पीड़ित है । तत्कालीन भाजपा शासन ने नक्सल पीड़ित होने के कारण जयहिंद लाटकर को शिक्षक पद पर नियुक्त किया था, नक्सलियों के डर से प्राथमिक शाला गोटाईगुड़ा में पदस्थ किया जो कि सुरक्षा केंप लगा है. वहाँ तत्कालीन सरपंच से विवाद के बाद उनका तबादला प्राथमिक शाला- बोरगुड़ा ( रुद्रारम) में किया गया, कुछ समय यहाँ रहने के बाद उन्हें कन्या आवासीय छात्रावास ( पोटाकेबीन)- भोपालपटनम आश्रित पेगड़ापल्ली में प्रभारी प्रधान पाठक बनाया गया । लेकिन शासन द्वारा बंद पड़े स्कूलों को पुनः खुलवाया तो उक्त शिक्षक को प्राथमिक शाला- रुद्रारम में भेजा गया, जहाँ लगभग – 25 से 30 विद्यार्थी अध्ययनरत है. अब यहाँ से सीधा आवासीय छात्रावास का अधीक्षक बनाया गया लेकिन अब इस स्कूल का और उन विद्यार्थियों का का क्या होगा क्योंकि यहाँ पर एक ही शिक्षक पदस्थ था. अब यह शिक्षक विहीन स्कूल होगा और विद्यार्थियों का भविष्य अंधकारमय होगा?

अब सवाल यह उठता है कि एक नक्सल पीड़ित शिक्षक को अधीक्षक बनाना कहा तक जायज है? उक्त शिक्षक ने नक्सलियों से जान का खतरा बताकर जितने भी स्कूलों में सेवा दिया वह या तो सुरक्षा केंप के करीब है या अंतर्राज्यीय मार्ग से सटा है. अपनी जान को खतरा बताकर मूल निवास स्थान रुद्रारम छोड़कर भोपालपटनम थाना के पीछे मकान बनाया ।

सवाल यह है कि उक्त शिक्षक अपने जान का खतरा बताकर सुरक्षा की दृष्टि से अन्य शालाओ में सेवा देता आया है. क्या वह पोटाकेबीन- संडरापल्ली में 24 घंटे छात्रों को सेवा दे पाएगा? क्या पोटाकेबीन संडरापल्ली सुरक्षा केंप के पास है? यदि अधीक्षक के साथ कुछ अनहोनी होता है तो जवाबदेही किसकी होगी? प्रश्न तो अनेक खड़े होंगे.

अब तो यही लग रहा है कि या तो शिक्षक अज्ञात लोगों का भय बताकर शासन- प्रशासन को गुमराह कर रहा है? या तो शासन- प्रशासन जानते हुए भी नजर अंदाज कर रहा है? उक्त शिक्षक को अधीक्षक बनाना कही शासन- प्रशासन के लिए ” गले की हड्डी ” साबित ना हो? ऐसा लोगों में चर्चा है.

इस संबंध में डीपीसी राठौर से फोन पर चर्चा की तो कहा कि ” इस प्रकार की कोई जानकारी नहीं है. प्रस्ताव आया तो हमने नियुक्ति की, वहीं जिला शिक्षाधिकारी प्रमोद ठाकुर से फोन पर चर्चा की तो कहा कि ” शिक्षक के बारे में जानकारी था लेकिन शिक्षक ने आवेदन दिया था. इस बारे में शिक्षक को सोचना चाहिए था. हमारे पास प्रस्ताव आया था. हमने अनुमोदन कर दिया. जहाँ एकल शिक्षक की बात है. हम उसकी भरपाई करेंगे “.

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