शुरू हुआ बोधघाट परियोजना का विरोध 23 जून 2025
जगदलपुर/बीजापुर/रायपुर :
छत्तीसगढ़ राज्य का बोधघाट परियोजना जो छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में इंद्रावती नदी पर भाजपा सरकार के द्वारा संभावित बताया जा रहा है यह बोधघाट परियोजना का जिन्न 40 वर्ष बाद बोतल से वापस बाहर निकला है।
मोरारजी देसाई की परिकल्पना
इस परियोजना की शुरुआत जनता पार्टी सरकार के समय जब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे, के कार्यकाल में 1979 में प्रारंभ करने के बारे में विचार किया गया था, लेकिन 1994 में पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद इस परियोजना की फाइल को बंद कर दी गई थी।
भुपेश बघेल ने की थी मांग, किन्तु…
2018 से 2023 के बीच प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री थे उन्होंने इस परियोजना को बनाने के लिए फिर से प्रयास शुरू किया और इस समय बस्तर संभाग के ताकतवर आदिवासी नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने इसका विरोध किया था, 13 दिसंबर 2023 को कांग्रेस की सरकार की विदाई हो गई
परियोजना का जिन्न बोतल से पुनः बाहर
छत्तीसगढ़ में एक बार फिर दिसंबर 2023 को भाजपा सरकार का गठन हुआ और विष्णु देव साय मुख्यमंत्री बने। उन्होंने बोधघाट परियोजना के जिन्न को बोतल से पुनः बाहर निकाला और एक फाइल लेकर कुछ ही दिनों पूर्व नई दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से चर्चा की और इसमें सहयोग करने की अपील की, प्रधानमंत्री से मिलने के बाद जब बाहर निकले तो पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने अन्य विषय के अलावा ताकत के साथ यह कहा कि छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में बोधघाट परियोजना को भाजपा सरकार वापस प्रारंभ करने के लिए तैयारी कर रही है।
बस… फिर क्या !
बस्तर संभाग के 7 जिलों में से 5 जिले के 56 गांव और 18 पंचायत जिनकी आबादी लगभग 50,000 बताई जा रही है तनाव में आ गया
और कुछ ही दिन पहले बस्तर संभाग के बीजापुर जिले में 56 गांव के आदिवासियों ने एक बड़ी बैठक कर बोध घाट परियोजना का विरोध करने का निर्णय लिया और 56 गांव में संघर्ष समिति का गठन किया और एक संयुक्त रूप से 56 गांव के लोगों को संगठित करने के लिए केंद्रीय स्तर पर संगठन का गठन किया और इसका विरोध करने का निर्णय लिया।
मुख्यमंत्री का बयान
विष्णु देव साय ने पत्रकारों को बताया था कि बोध घाट परियोजना बनने से बस्तर संभाग के 3,78,475 हेक्टर भूमि को सिंचाई की सुविधा मिलेगी और इस बांध के बनने से 125 मेगावाट बिजली का भी उत्पादन होगा। इतना ही नहीं इस बोध घाट परियोजना के बनने से मछली उत्पादन में भी बढ़ोतरी होगी और वह लगभग 5,000 टन मछली का उत्पादन होगा।
आदिवासी अडिग…
आदिवासियों ने अपनी बैठक में निर्णय लिया कि हम अपने पुरखों की जमीन बोधघाट परियोजना के लिए नहीं देंगे और इसके लिए हमें जान भी देना पड़े तो हम देंगे और सरकार से भी बात करेंगे।
जलसंसाधन एवं वन मंत्री पर दबाव
आदिवासियों की बैठक में यह भी तय हुआ कि छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में नारायणपुर विधायक केदार कश्यप जो जल संसाधन मंत्री भी है और वन एवं पर्यावरण विभाग भी उनके पास है, उनका इस विषय पर मौन रहना यह उचित नहीं है, वे आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करते हैं उन्हें यहां की स्थिति से पूरी तरह जानकारी है और सरकार के पास ताकत से आदिवासियों की भावना को उन्हें रखना चाहिए, आदिवासी ग्रामीण केदार कश्यप से भी भेंट करने की बात कर रहे हैं और अपना विरोध दर्ज करेंगे।
बिना पूछे-बताये, कदम उठाया गया
आदिवासियों की यह भी नाराजगी है कि गांव वालों से और आदिवासियों से जो कि यहां की बहुलता वाली जनसंख्या है जो प्रभावित होने जा रही है उनसे बगैर चर्चा किये, मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के पास यहां प्रस्ताव नहीं रखना चाहिए था।
आदिवासियों का यह भी कहना है कि जो उनके बैठक में चर्चा हुई कि हमारे छप्पन गांव जो प्रभावित होने जा रहा है वहां देव स्थल भी है जो पुरखों का बनाया हुआ है वह सब उजड़ जाएगा, हमें नहीं चाहिए।
आंदोलन-संघर्ष की तैयारी
सरकार के द्वारा दूसरा स्थान देने का प्रस्ताव है किन्तु हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।
56 गांव के आदिवासियों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि 5 जिले के वे गांव जो प्रभावित हो रहे हैं, सभी संभाग मुख्यालय जगदलपुर में संघर्ष करेंगे और राजधानी रायपुर तक भी पदयात्रा कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ी तो हम नई दिल्ली भी जाएंगे। लेकिन हम अपनी जमीन नहीं देंगे।
क्या भाजपा को नुकसान होगा
अब देखना यह है कि छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार का अगला कदम क्या होगा। कहीं आदिवासियों की यह नाराजगी भाजपा को राजनीतिक दृष्टि से कहीं नुकसान न पहुंचा दे, इस परियोजना को लेकर बस्तर संभाग एक बार फिर गर्म हो सकता है।
बालमुकुंद शर्मा : कांकेर/रायपुर
