अमृत सरोवर घोटाले के दागी अफसर को बचाने की कवायद
–अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर संभाग के सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड की एक दर्जन से अधिक ग्राम पंचायतों में अमृत सरोवर योजना के नाम पर हुए 100 करोड़ के भ्रष्टाचार के दागी अफसर को बचाने के लिए हर संभव कोशिशें की जा रही हैं। जिले के बड़े अधिकारी भी जनपद सीईओ को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जबकि इस मामले से तीन पंचायत कर्मियों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों के तार भी जुड़े हुए हैं। कहा जा रहा है कि मामले का राजफाश न हो जाए, इसलिए इन कर्मियों की हत्याएं की गई हैं।
यह गंभीर और संगीन मामला तब और तूल पकड़ा जब मृत कर्मियों के परिजनों ने मामले की शिकायत केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव से की। इस मामले में संलिप्त पूर्व मंत्री के करीबी माने जाने वाले दागी अधिकारी को बचाने जिले के लिए जिम्मेदार बड़े अफसर द्वारा साजिश रची जाने की भी चर्चा। है मामले की खुलासा से बचने के लिए कोंटा के जनपद सीईओ को पहले लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया था। दोबारा ज्वाईनिंग के बाद सीईओ वित्तीय पॉवर मांगने बड़े साहब के पास गुहार लगाने पहुंचे। तब साहब ने उनसे एक शपथ पत्र लिखवा कर जनपद सीईओ को दोबारा अवकाश पर जाने की नसीहत देते हुए छुट्टी पर भेज दिया और कोंटा जनपद का प्रभार डिप्टी कलेक्टर को सौंप दिया। इसके पूर्व तहसीलदार को कोंटा जनपद का प्रभार दिया गया था। खबर है कि उक्त सीईओ को जिला पंचायत में अटैच कर दिया गया है। जनपद सीईओ ने मनरेगा मजदूरी के बड़े घोटाले का राज छुपा रखा है। यह घोटाला सुकमा के तेंदूपत्ता घोटाला से भी बड़ा है। इस राज को फाईलों में ही दफन रखने की साजिश भी रचे जाने की खबर है। जिला कलेक्टर के पास कई पंचायतों की जांच रिपोर्ट भी जमा कराई जा चुकी है जिसमें बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा किया गया है। मगर कार्रवाई अब तक नजर नहीं आई है। ज्ञातव्य हो कि सुकमा जिले का कोंटा विकासखंड की दर्जन भर से अधिक पंचायत भ्रष्टाचार को लेकर सुर्खियों में हैं। इन पंचायतों में हुए भ्रष्टाचार मामले में पूर्व सरकार के मंत्रियों का सीधा हस्तक्षेप रहा है जिनके इशारों पर अधिकारी ने योजना को सिर्फ कागजों पर उतार कर सरकारी राशि की बंदरबांट कर ली। ऐसे में करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी को बचाने भाजपा सरकार के अफसर भी पूरी कोशिश कर रहे हैं। ऐसे अधिकारी अफसर के आगे पीछे लेफ्ट-राईट करते देखे जा सकते हैं।
नियद नेल्ला नार भी खतरे में
ऐसे दागी अधिकारी को सरकार की ड्रीम प्रोजेक्ट नियद नेल्लानार का प्रभार सौंपकर एकबार फिर भ्रष्टाचार कर सरकार की छबि को धूमिल करने की छूट दे दी गई है। ऐसे अधिकारी तबादले के बाद भी जुगाड़ जमाकर सुकमा जिले में जमे हैं जिन पर उद्योग मंत्री का भी आशीर्वाद बना हुआ है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कोंटा जनपद के फाईलों में मनरेगा मजदूरों के भ्रष्टाचार का राज छुपा है जिसके कारण सीईओ की अदला बदली करना साहब की मजबूरी बन गई है ताकि अधिकारी को बचाया जा सके। जानकारी के अनुसार कोंटा सीईओ लंबे अवकाश के बाद जब अपनी ज्वाईनिंग देकर जिले के साहब के पास डीडी पॉवर मांगने पहुंचे तो साहब ने साफ इंकार कर दिया। साहब ने सीईओ फटकार लगाते हुए एक बीमारी के बहाने वाले शपथ पत्र तैयार कराकर छुट्टी पर जाने की नसीहत दे दी। अधिकारी साहब की फटकार सुनने के बाद अपने घर निकल गए। कुछ दिन बाद जब वापस लौटे तो उन्हें कोंटा सीईओ का जिम्मेदारी देने के बजाय जिला पंचायत में अटैच कर दिया गया। उक्त अधिकारी अब यह कहते फिर रहे हैं कि मेरा गुनाह क्या है जो गुनाहगार है उसे तो जिले से बाहर भेजने के बजाय रोक कर रखा गया है।
जांच रिपोर्ट फाईलों में बंद
कोंटा जनपद की ग्राम पंचायत एलमपल्ली, गुमोड़ी, मुकरम, बंडा समेत आधा दर्जन ग्राम पंचायतों में हुए भ्रष्टाचार की जांच रिपोर्ट साहब के पास पहुंचे महीनों बीत चुके हैं, लेकिन जांच रिपोर्ट फाईलों में धूल खा रही है। जांच में भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद भी अफसर चुप्पी साध चुके हैं। वहीं मेहता, मोरपल्ली एवं केरलापेंदा पंचायतों का जांच फाईल प्रसाद के आदान प्रदान में गायब कर दी जाने की भी खबर है। इसके एवज में प्रसाद कई शासकीय सेवकों तक पहुंचाए जाने की खबर है।
कलेक्टर क्यों हैं मौन
इस गंभीर प्रकरण में सुकमा कलेक्टर की चुप्पी भी रहस्यमयी है। ग्राम पंचायतों की जांच रिपोर्ट एवं कोंटा जनपद सीईओ के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कलेक्टर से फोन पर संपर्क कर प्रतिक्रिया जानने का प्रयास किए जाने पर कलेक्टर ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। इससे ऐसा जान पड़ता है कि काजल की कोठरी में नीचे से ऊपर तक सभी दागदार हैं।
