कवर्धा वनमंडल में आई.जी.एन.एफ.ए. देहरादून के 33 प्रोबेशनर्स अधिकारियों का दो दिवसीय प्रशिक्षण भ्रमण


कवर्धा,,,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून के वर्ष 2025-27 बैच के 33 भारतीय वन सेवा के प्रोबेशनर्स अधिकारियों का छत्तीसगढ़ राज्य वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अंतर्गत कवर्धा वनमंडल में “Soil & Water Conservation Measures and Watershed Management Exercise” विषय पर दिनांक 11 से 12 मार्च 2026 तक दो दिवसीय प्रशिक्षण भ्रमण आयोजित किया गया है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत समस्त प्रोबेशनर्स अधिकारियों को चिन्हांकित 04 नालों के लिए पृथक-पृथक 04 समूहों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक समूह द्वारा संबंधित नाले के आधार पर प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए पी.पी.आर./डी.पी.आर. तैयार किया जाएगा। प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु एन.आर.एम. इंजीनियर तथा कवर्धा वनमंडल के तकनीकी सहायकों सहित समूहवार अधिकारियों की ड्यूटी निर्धारित की गई है।

दिनांक 11 मार्च 2026 को कवर्धा वनमंडल के सभागार में श्रीमती अजीता लॉगजम (भा.व.से. 2012), निखिल अग्रवाल, वनमंडलाधिकारी, कवर्धा, नवनीत नायक, एन.आर.एम. इंजीनियर, जी.आई.एस. एक्सपर्ट, कैम्पा, समस्त उपवनमंडलाधिकारी तथा अधीक्षक भोरमदेव अभ्यारण्य की उपस्थिति में सभी 33 प्रोबेशनर्स अधिकारियों से सामान्य परिचय प्राप्त किया गया। इसके उपरांत अधिकारियों को “Soil & Water Conservation Measures and Watershed Management Exercise” विषय पर गूगल अर्थ एवं क्यू.जी.आई.एस. सॉफ्टवेयर के माध्यम से प्रोजेक्ट तैयार करने संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

प्रशिक्षण के पश्चात समस्त अधिकारियों द्वारा निर्धारित समूहों के अनुसार चयनित नालों में जाकर स्थल निरीक्षण एवं ग्राउंड ट्रूथिंग की गई। प्रशिक्षण के द्वितीय दिवस पुनः क्षेत्रीय भ्रमण कर अधिकारियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा तथा सभी प्रोबेशनर्स अधिकारियों द्वारा पी.पी.आर./डी.पी.आर. तैयार किया जाएगा।

उक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वन क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण के कार्यों को समझना तथा जलागम प्रबंधन की प्रभावी योजना तैयार करना है। ‘रीज टू वैली’ (Ridge to Valley) अवधारणा के आधार पर विभिन्न संरचनाओं का चयन किया जाता है, जिनमें ब्रशवुड चेक, बोल्डर चेक डेम, गेबियन स्ट्रक्चर, कंटूर ट्रेंच, स्टॉप डेम, चेक डेम, मिट्टी बांध तथा गली प्लग आदि संरचनाएं शामिल हैं। इन संरचनाओं के माध्यम से वन क्षेत्रों में जल संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण तथा मृदा संरक्षण को बढ़ावा दिया जाता है।

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