प्रमुख सचिव बनाम SEIAA चेयरमैन :साख बचाने सुप्रीम कोर्ट पहुँचे IAS कोठारी, पर्सनल कैपेसिटी में दाखिल की अर्जी , खनन माफिया कनेक्शन या अफसरशाही की नाकामी ?

राजेश भाटिया

नई दिल्ली : मध्यप्रदेश में पर्यावरण स्वीकृतियों का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है। Writ Petition (Civil) No. 689/2025 के तहत दाखिल इस जनहित याचिका में आरोप है कि 237 पर्यावरणीय मंजूरियाँ गैरकानूनी तरीके से जारी की गईं। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “इतनी बड़ी संख्या में स्वीकृतियां यदि नियमों के विपरीत दी गई हैं तो यह गंभीर मामला है और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी।”

क्या है मामला

यह याचिका वरिष्ठ पत्रकार विजय कुमार दास ने दाखिल की थी, जिसमें मांग की गई कि सभी 237 मंजूरियों को अवैध घोषित किया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच करवाई जाए। आरोप यह भी है कि पर्यावरणीय मूल्यांकन प्रक्रिया को दरकिनार कर खनन माफिया और उद्योग समूहों को फायदा पहुँचाया गया। मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से जवाब मांग चुका है। याचिका में कहा गया कि SEIAA (State Environment Impact Assessment Authority) की बैठकें महीनों तक टाल दी गईं और तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट्स दबा दी गईं।

टकराव की पृष्ठभूमि

सूत्रों के मुताबिक, यह विवाद मुख्य रूप से SEIAA चेयरमैन एस.एन.एस. चौहान और राज्य के पर्यावरण विभाग के शीर्ष अफसरों (प्रमुख सचिव और सदस्य सचिव) के बीच खिंचाव से पैदा हुआ। चेयरमैन चौहान का दावा है कि उन्होंने अवैध मंजूरियों का विरोध किया और 50 से ज्यादा बार सरकार व मुख्य सचिव को लिखित शिकायत भेजी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी ओर, अफसरों पर आरोप है कि उन्होंने जानबूझकर SEIAA को पंगु बना दिया और खनन माफिया को फायदा पहुँचाने के लिए फाइलें आगे बढ़ा दीं।

अपनी साख बचाने सुप्रीम कोर्ट पहुँचे पूर्व प्रमुख सचिव

मध्यप्रदेश के पूर्व प्रमुख सचिव (पर्यावरण) डॉ. नवीन कोठारी, आईएएस ने अपनी साख बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में Intervention Application दाखिल की है। डॉ. कोठारी ने कहा कि याचिका में उनके कार्यकाल पर लगे आरोप निराधार हैं। उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा कानून और EIA Notification, 2006 के तहत ही काम किया और SEIAA की आंतरिक खींचतान के कारण स्वीकृतियों में गड़बड़ी हुई। उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह अर्जी विष्णु शर्मा, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड, सुप्रीम कोर्ट ने पेश की।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

अदालत ने अब तक की सुनवाई में कहा है कि ” यदि इतने बड़े पैमाने पर स्वीकृतियां नियमों को दरकिनार कर दी गईं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संस्थागत विफलता है। जिम्मेदार अफसरों को व्यक्तिगत तौर पर जवाबदेह ठहराया जाएगा।”

यक्ष प्रश्न यह है कि क्या कोई प्रमुख सचिव नियमानुसार अनुमति दे सकता है ? और दे सकता है तो फिर सिया जैसी संस्था की प्रासंगिता क्या ?

EIA Notification 2006 (पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना) और Environment Protection Act, 1986 स अधिसूचना के अनुसार – किसी भी नए प्रोजेक्ट, गतिविधि, विस्तार या आधुनिकीकरण को शुरू करने से पहले अनिवार्य रूप से पूर्व पर्यावरणीय अनुमति (Prior Environmental Clearance-EC) लेना आवश्यक है। यह अनुमति या तो केंद्र सरकार (Category A प्रोजेक्ट्स के लिए) या SEIAA (State Environment Impact Assessment Authority) ( Category B प्रोजेक्ट्स के लिए) द्वारा दी जाती है।

प्रमुख सचिव (Principal Secretary) या कोई अन्य अधिकारी व्यक्तिगत रूप से अपने स्तर पर इस अनुमति को न तो प्रदान कर सकते हैं और न ही इसे दरकिनार कर सकते हैं।

प्रक्रिया स्पष्ट है: Screening → Scoping → Public Consultation → Appraisal → Clearance. यदि इसे तोड़ा जाए तो यह EIA Notification 2006 और Environment Protection Act 1986 का सीधा उल्लंघन होगा। इसीलिए प्रमुख सचिव द्वारा स्वयं अनुमति देना कानून के दायरे में संभव नहीं है।

यह केवल नियामक प्राधिकरण (MoEFCC / SEIAA) ही कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या?

मामला अब सोमवार को दोबारा सूचीबद्ध है। सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि सुप्रीम कोर्ट अगला कदम क्या उठाएगा। क्या कोर्ट सीधे जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश देगा ? या फिर यह मामला स्वतंत्र एजेंसी को जांच के लिए सौंपा जाएगा? यह सुनवाई सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे देश में पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर मिसाल कायम कर सकती है। देखना दिलचस्प होगा अनुमतियों को वैध माना जाता है या उल्लंघन ?

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