अधिकारी और पंचायत प्रतिनिधि बेच रहे हैं वन परिसर की जमीन!
–अर्जुन झा-
बकावंड। वन अधिकार पत्र योजना की आड़ में बकावंड विकासखंड में वन विभाग के कार्यालय परिसर की जमीन को अवैध तरीके से बेचे जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। विभाग के अधिकारी और पंचायत प्रतिनिधि यह खेल कर रहे हैं। ये लोग ग्रामीणों से लेनदेन कर वन विभाग के कार्यालय परिसर की जमीन के वन अधिकार पत्र जारी करवा रहे हैं।
गफलतबाजी का यह मामला बकावंड विकासखंड की ग्राम पंचायत राजनगर में हुआ है। यहां वन विभाग के स्थानीय अधिकारी के संरक्षण में वन भूमि का विक्रय किया जा राहा है। बकावंड वन परीक्षेत्र के वन विभाग परिसर की जमीन अवैध तरीके से ग्रामीणों के पास बेची जा रही है। बड़े अधिकारी कुंभकरण की नींद सो रहे हैं। सूत्र के अनुसार वन विभाग के अधिकारी एवं ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों की सांठगांठ से वन विभाग कार्यालय परिसर की भूमि को वन अधिकार पट्टे जारी करवा गए हैं। ग्राम पंचायत राजनगर की ब्लॉक कॉलोनी में वन विभाग कार्यालय परिसर के खसरा नंबर 2386/1 और 2386/2 की भूमि को टुकड़ों में विभाजित करवा कर पट्टा बनवा दिया गया है। मूल नक्शा में खसरा नंबर 2386 है। किस अधिकार के तहत वन विभाग के अधिकारी द्वारा वन विभाग परिसर की भूमि को दो भागों विभाजित किया गया है यह जांच का विषय है। प्रशासनिक अधिकारी इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। आलम यह है कि आने वाले दिनों में शासकीय भवनों के लिए भी जमीन नहीं बचेगी। शासन ने वन भूमि पर काबिज लोगों को वन अधिकार पत्र जारी करने के लिए जो नियम तय कर रखे हैं, उनका यहां खुलेआम उल्लंघन किया गया है। नियम के अनुसार 13 दिसंबर 2005 के पूर्व तीन पीढ़ियों यानि 75 वर्ष से जिन व्यक्तियों के कब्जे में वन भूमि नहीं है वे परंरागत अन्य वननिवासी नहीं कहलाएंगे और पट्टे के हकदार नहीं होंगे। वन अधिनियम की धारा 4 (3) के अनुसार वन अधिकार पत्र हेतु एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों के मध्य भेद नहीं है। 13 दिसंबर 2005 के पूर्व से वन भूमि पर कब्जा होना चाहिए। अन्य परम्परागत वन निवासी को वन अधिकार हेतु पात्र होने के लिए तीन शर्तें पूर्ण करना आवश्यक है। पहली शर्त वन या वनभूमि में 13 दिसंबर 2005 के पूर्व तीन पीढ़ियों यानि 75 वर्ष से निवासरत होना आवश्यक है। दूसरा जीविका हेतु वन या वनभूमि पर आश्रित हों।
तीसरी शर्त 13 दिसंबर 2005 के पूर्व वन भूमि पर काबिज हो। निवासरत का आशय कब्जा नहीं है, अन्य परम्परागत वनवासी कि पात्रता हेतु ग्राम में 75 वर्ष से निवासरत होने का एवं वनभूमि पर आश्रित होने का साक्ष्य प्रस्तुत करना होगा। जैसा कि जनजाति कार्य मंत्रालय द्वारा पूर्व में जारी अपने पत्र में स्पष्ट कर दिया गया है।
