भद्रकाली में फिर लौट आया रेत माफिया का राज;, रोज 40 हाइवा ट्रक रेत लेकर जा रहे हैं तेलंगाना



-पुकार बाफना-
बीजापुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के बीजापुर जिले के अंतिम छोर पर बसे भद्रकाली गांव में अवैध रेत खनन का काला कारोबार एकबार फिर जोर पकड़ने लगा है। दिन के उजाले में रेत लदे सैकड़ों ट्रक, हाइवा तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद की ओर रवाना हो रहे हैं। इस नजारे को देख स्थानीय ग्रामीणों का खून खौल रहा है। अपने ही जिले के संसाधनों का फायदा न उठा पाने की हताशा और माफिया के हौसले बुलंद होने का गुस्सा ग्रामीणों में साफ नजर आ रहा है। प्रशासन चुपचाप तमाशा देख रहा है। खनिज विभाग की मौन सहमति और सत्ता पक्ष के कथित दबाव ने इस रेत घोटाले में नई जान फूंक दी है। यह कोई नई कहानी नहीं है। कुछ माह पहले ही भद्रकाली और आसपास के इलाकों में रेत माफिया की मनमानी पर प्रशासन ने शिकंजा कसा था। कार्रवाई में अवैध उत्खनन पर रोक लगाई गई, भंडारित रेत को सीज कर दिया गया। इससे ग्रामीणों को लगा था कि अब तो स्थायी समाधान हो गया, लेकिन हकीकत कुछ और निकला। माफिया ने सिर्फ सिर छिपाया, पूंछ बाहर रखी। अब वे लंबे अंतराल के बाद फिर सक्रिय हो चुके हैं, और इस बार भी उतने ही।

40 हैवी ट्रकों से परिवहन
सूत्रों के मुताबिक, पिछले हफ्ते से ही भद्रकाली नदी किनारे पर 40 से अधिक हाइवा और ट्रक रेत लादने के लिए खड़े नजर आ रहे हैं। ये वाहन खुलेआम, बिना किसी रोक-टोक के रेत भर रहे हैं और सीधे तेलंगाना बॉर्डर की ओर बढ़ जाते हैं। स्थानीय किसान ने बताया कि हमारे गांव की नदी की रेत हमारे जिले के निर्माण में इस्तेमाल होना चाहिए।माफिया इसे हैदराबाद के बाजारों में बेच रहे हैं। हमारा क्या? सड़कें टूटी, घर बनते ही नहीं। ग्रामीणों में नाराजगी चरम पर है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि इतनी बड़ी मात्रा में रेत का अवैध परिवहन बिना प्रशासन की निगाह के कैसे संभव है?

सबकी मिलीभगत है यहां
सूत्रों का दावा है कि खनिज विभाग के अफसरों की मौन सहमति के बिना यह सारा खेल नहीं चल सकता। रातों रात इतने हाइवा आ जाएं, रेत भर लें और बॉर्डर क्रॉस कर लें। यह तो साफ तौर पर सिस्टम की मिलीभगत का नतीजा है। भद्रकाली जैसे सीमावर्ती इलाकों में अवैध उत्खनन सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आपदा भी है। नदी तटों के अंधाधुंध दोहन से न केवल मिट्टी कटाव बढ़ा रहा है, बल्कि भूजल स्तर को भी गिरा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि रेत माफिया के कारण नदी का प्रवाह बदल गया है, बाढ़ का खतरा बढ़ा है। हमारे खेत सूख रहे हैं, मछली पकड़ना मुश्किल हो गया। माफिया को फायदा, हमें नुकसान। एक बुजुर्ग महिला ने आंसू पोछते हुए यह बात कहा।

स्थानीय निर्माण कार्य ठप भोपालपटनम जिले में सड़कें, स्कूल, अस्पताल आदि का निर्माण रेत की कमी से प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन माफिया को फिक्र नहीं। वे तो हैदराबाद के रियल एस्टेट कारोबारियों को सप्लाई कर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। अनुमान है कि रोजाना 500-600 टन रेत की तस्करी बीजापुर जिले से हो रही है, जिससे लाखों का काला धन बह रहा है।भोपालपटनम-तेलंगाना बॉर्डर पर माफिया का नेटवर्क सालों से सक्रिय है। हाइवा न केवल रेत लाद रहे हैं, बल्कि सुरक्षा के नाम पर माफिया के गुर्गे भी तैनात हैं। स्थानीय पुलिस पेट्रोलिंग नाममात्र की होती है। एक पूर्व पंचायत सदस्य ने बताया कि रात में तो खैर, लेकिन दिन में भी ये ट्रक खुले घूम रहे हैं। चेकपोस्ट पर नजर क्यों बंद? यह सवाल जिला पुलिस और खनिज विभाग दोनों से है। अगर तत्काल छापेमारी हो, तो लाखों का सामान जब्त हो सकता है। लेकिन देरी हो रही है। जहां संसाधन स्थानीय विकास के लिए हैं, वहां माफिया का कब्जा हो गया है। सत्ता पक्ष का दबाव हो और विभागीय भ्रष्टाचार दोनों ही लोकतंत्र के लिए खतरा हैं।

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