भटकाव भरी जिंदगी से बाहर निकल आओ भाइयों, परिजन कर रहे हैं इंतजार



-अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर अब फिर से शांति का टापू बनता जा रहा है। इस संभाग से माओवाद खात्मे की कगार पर है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा दी गई डेड लाइन 31 मार्च 2026 को महज तीन दिन शेष रह गए हैं। इस बीच आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों ने जंगलों में भटक रहे अपने बचे पुराने साथियों से मार्मिक गुहार लगाई है। समाज और लोकतंत्र की मुख्यधारा से जुड़ चुके इन पूर्व नक्सलियों ने बचे खुचे अपने पुराने साथियों से अपील की है कि यहां खुले आसमान तले घर परिवार के बीच की जिंदगी से बेहतर जिंदगी और कहीं नहीं है। आप भी लौट आएं जंगल की भटकाव भरी जिंदगी से बाहर निकल कर।
यह मार्मिक अपील बीजापुर जिले के बेदरे थाना क्षेत्र के ग्राम केरपे से सामने आई है। कम्युनिटी पुलिसिंग के तहत इस गांव में आयोजित कार्यक्रम में कार्यक्रम में कई आत्मसमर्पित नक्सलियों ने भी सहभागिता दर्ज कराई थी। इन्हीं पूर्व नक्सलियों ने जंगलों में बिना हथियार के और बेसहारा भटक रहे अपने पुराने साथियों से आत्मसमर्पण कर सम्मान पूर्वक और सुरक्षित जीवन यापन करने की अपील की। उल्लेखनीय है कि बस्तर में ज्यादातर नक्सली लीडर मारे जा चुके हैं, कई सरेंडर कर चुके हैं और कुछ अपने राज्यों में पलायन कर गए हैं। बस्तर में अब सौ से भी कम सक्रिय नक्सली रह गए हैं, वह भी निहत्थे। ये नक्सली नेतृत्वहीन होकर जंगलों में भटक रहे हैं। उनके पास खाने पीने का भी सामान नहीं है। बाहर से आए बड़े नक्सली उन्हें बेसहारा छोड़ गए हैं। दूसरे राज्यों से आए नक्सलियों ने माओवाद की आड़ में जल, जंगल, जमीन और शोषण के नाम पर ऐसा जाल फेंका कि उसमें बस्तर के भोले भाले लोग उलझते, फंसते चले गए। बाहरी बड़े नक्सली तो यहां के ठेकेदारों, बड़े अधिकारियों से बेतहाशा धन दौलत वसूल कर अपने घर भरते रहे, बड़े शहरों में प्रॉपर्टी खड़ी करते रहे, मगर उनके जाल में फंसे स्थानीय लोग उनके शोषण का शिकार होते रहे। यहां की युवतियों को अपने संगठन में भर्ती कर बाहरी बड़े नक्सली उनका दैहिक शोषण भी करते रहे हैं। सुरक्षा बलों को नक्सलियों के डंप से कई बार गर्भ निरोधक और गर्भपात की दवाएं, कंडोम आदि मिल चुके हैं। नक्सलियों के लगभग चार दशक के साम्राज्य को हमारी सरकारों की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा बेहतरीन पुनर्वास नीति और सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति ने ध्वस्त करके रख दिया है। माओवाद के खात्मे की डेड लाइन को महज तीन दिन रह गए हैं और बस्तर जंगलों में तीन दर्जन से ज्यादा नक्सली घूम रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि इन तीन दिनों के भीतर बचे नक्सली भी समाज और लोकतंत्र की मुख्यधारा से जुड़ जाएंगे।



पुलिस की संवेदनशील पहल
बीजापुर जिले के थाना बेदरे के ग्राम केरपे में सामुदायिक पुलिसिंग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ग्राम केरपे, मरीमड़गु, पेद्दागुंडापुर, मादेपुर, ओडरी के लगभग 400 ग्रामीणों ने भाग लिया। इस दौरान कुटरू के एसडीओपी बृजकिशोर यादव ने ग्रामीणों को शासन की जन कल्याणकारी योजनाओं, बच्चों की शिक्षा, रोजगार एवं स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर जागरूक किया। शासन की जनहितैषी योजनाओं से अवगत कराते हुए उनका लाभ उठाने के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया गया। मुख्यधारा में शामिल हो चुके पूर्व नक्सलियों को गैर कानूनी गतिविधियों से दूर रहने की समझाईश दी गई। संगठन में अभी भी सक्रिय नक्सलियों से जंगलों में भटकने के बजाय अपने परिवारों के पास लौट आने की अपील की गई।पुनर्वासित हो चुके नक्सलियों ने भी अपने पूर्व साथियों से हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने की अपील की। इन पूर्व नक्सलियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जंगल का जीवन एवं हिंसा का मार्ग केवल कष्ट और दुखदायी है। इससे न तो व्यक्तिगत विकास और न ही समाज का भला होता है। बदलते समय के साथ बदलाव को स्वीकार कर सामाजिक जीवन जीने के लिए अपील की गई।कार्यक्रम में जरूरतमंद ग्रामीणों को आवश्यक सामग्री, स्कूली बच्चों को शिक्षण सामग्री, युवाओं को खेल सामग्री का वितरण किया गया। ग्रामीणों ने बच्चों की शिक्षा एवं क्षेत्र के विकास कार्यों में सहभागी बनने की शपथ ली।सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कुटरू की टीम ने ग्रामीणों का ईलाज किया और दवाएं दी।

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