धर्मांतरित लोगों को नहीं मिलना चाहिए आरक्षण का लाभ: संजय मौर्य



जगदलपुर। मुरिया समाज के युवा प्रतिनिधि संजय मौर्य ने कहा है कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए डी-लिस्टिंग की प्रक्रिया को वर्तमान समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता है।
24 मई को नई दिल्ली में आयोजित होने वाली ‘गर्जना रैली’ के समर्थन में मुरिया समाज के युवा संजय मौर्य ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि यह वैचारिक आंदोलन किसी समुदाय विशेष के विरोध में नहीं है,बल्कि यह उन वास्तविक आदिवासियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने की एक न्यायपूर्ण लड़ाई है जो आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं।संजय मौर्य ने आदिवासी समाज की मूल पहचान के संरक्षण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आरक्षण जैसी संवैधानिक सुविधाओं का प्राथमिक लाभ केवल उन्हीं व्यक्तियों को मिलना चाहिए जो अपनी मूल जनजातीय परंपराओं, विशिष्ट संस्कृति और प्राचीन रूढ़ियों का निष्ठापूर्वक पालन कर रहे हैं। उनके अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपनी मूल आस्था और सामाजिक संरचना को त्याग कर धर्मांतरण कर लेता है, तो वह स्वतः ही उस सामाजिक ताने बाने से अलग हो जाता है। इसके आधार पर उसे विशेष आरक्षण दिया गया था। ऐसी स्थिति में, धर्मांतरित व्यक्तियों को मिलने वाले आरक्षण के लाभ पर कानूनी पुनर्विचार करना न्यायसंगत और आवश्यक हो जाता है। संजय मौर्य ने धर्मांतरण के पश्चात आरक्षण का लाभ लेने को ‘हक की चोरी’ करार देते हुए कहा कि आज बड़ी संख्या में ऐसे लोग आरक्षण का दोहरा लाभ उठा रहे हैं जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से पूरी तरह कट चुके हैं। इस विसंगति के कारण उन गरीब,पिछड़े और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों का अधिकार मारा जा रहा है, जो तमाम अभावों के बावजूद अपनी पारंपरिक पहचान और पूर्वजों की विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

शिक्षा, सेवा की आड़ में मतांतरण
जनजातीय क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति पर युवा नेता संजय मौर्य ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की आड़ में जो मतांतरण का खेल चल रहा है, वह अंततः जनजातीय अस्मिता को विलुप्त होने की कगार पर ले जा रहा है। उन्होंने जनजातीय समाज, बुद्धिजीवियों और युवाओं से आह्वान किया है कि वे दिल्ली में आयोजित होने वाली ऐतिहासिक ‘गर्जना रैली’ में अपनी पूरी शक्ति के साथ सम्मिलित हों। संजय मौर्य ने आगे कहा कि आरक्षण की व्यवस्था की मूल भावना को सुरक्षित रखा जाए ताकि इसका लाभ केवल समाज के पात्र और मौलिक व्यक्तियों तक ही सीमित रहे। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अविलंब ‘डी-लिस्टिंग’ पर एक स्पष्ट और प्रभावी राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।

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