आरटीआई में धारा 8 (1) को अफसरों ने बनाया हथियार!
अर्जुन झा-
जगदलपुर। सूचना का अधिकार कानून यानि आरटीआई सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए लाया गया है, मगर इस कानून में एक प्रावधान ऐसा भी है जो भ्रष्टाचार छुपाने के लिए अधिकारियों का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। पूरे बस्तर संभाग में आरटीआई के इस आर्टिकल की आड़ अधिकारी बड़ा खेल कर रहे हैं।
दरअसल सूचना का अधिकार अधिनियम में निहित धारा 8 (1) की आड़ में बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों के अधिकारी निर्माण कार्यों, उनकी मौजूदा स्थिति, भुगतान का विवरण आदि जानकारी देने से साफ इंकार कर देते हैं। दरअसल सूचना का अधिकार अधिनियम 2025 की धारा 8 (1) में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी का प्रकटन करना प्रतिविधित है। चूंकि कैशबुक में व्यक्तियों की व्यक्तिगत जानकारी अंकित रहती है, इसलिए कैशबुक का अवलोकन करने की अनुमति प्रदान नहीं की जा सकती। इस धारा को अधिकारियों ने भ्रष्टाचार छुपाने के लिए ब्रम्हास्त्र के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को इसी धारा 8 (1) का हवाला देकर किसी भी प्रकरण की जानकारी देने से साफ इंकार कर दिया जाता है।
बस्तर संभाग के सभी जिलों में सभी विभागों के अधिकारियों द्वारा सूचना के अधिकार की धारा 8(1) की शक्तियों का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है। सुकमा जिले में तो इस मामले को लेकर अति ही हो गई है। अधिकारी इस धारा की आड़ में दफ्तर से संबंधित कोई भी जानकारी देने से साफ मना कर देते हैं। एक समय था जब अधिकारी कई जानकारियां स्वतंत्र रूप से पत्रकारों को मामले की पारदर्शिता और स्पष्टता के लिए उपलब्ध करा दिया करता थे। वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े बड़े और गंभीर मामलों की जानकारी जुटाने के लिए एकमात्र विकल्प सूचना का अधिकार ही होता है। और सूचना के अधिकार में ऐसे ऐसे जवाब मिलते हैं कि हंसी नहीं रुकती। इस मामले को ही देख लीजिए। यह मामला सुकमा जिले में एक बड़ा और गंभीर मामला है। हालांकि दस्तावेज मिलने तक इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, लेकिन विचारणीय है कि करोड़ों रुपए की वित्तीय गड़बड़ी की जानकारी को छुपाने के लिए विभाग किस किस तरह के हथकंडे आजमाता है, यह उजागर हो गया है।
यह कैसा “व्यक्तिगत”?
जनप्रतिनिधि जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं। पंच, सरपंच, जनपद सदस्य, जनपद अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य व अध्यक्ष तथा विधायक एवं सांसद चुने जाने के बाद उनका जीवन सार्वजनिक यानि जनता के लिए समर्पित माना जाता है। इसी तरह अधिकारी और कर्मचारी शासकीय सेवक होते हैं और जनता के प्रति उनकी जवाबदेही भी होती है। अगर कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी कर्मचारी वित्तीय गड़बड़ी करता है तो, वह अपनी निजी संपत्ति की तो गड़बड़ी नहीं करेगा। गड़बड़ी जनता के सरकार को दिए टैक्स के पैसों की ही की जाती है। सरकारी कैश मेमो में उनका नाम जनप्रतिनिधि के नाते और सरकारी अधिकारी कर्मचारी के रूप में दर्ज होता है, न कि व्यक्तिगत नाम से। इस आधार पर तथाकथित “व्यक्तिगत” की दलील खोखली साबित हो जाती है।
