सोने की नाव, चांदी की पतवार अर्पित कर जलनी आया से मांगी नवाखाई की अनुमति
-अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर अंचल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और लोक आस्था की एक अद्भुत झलक आज ग्राम पंचायत घाट कवाली में देखने को मिली। बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित इस ग्राम पंचायत में पारंपरिक ‘नया खानी’ (नवाखाई) तिहार मनाने की तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। लेकिन इस परंपरा शुरू करने से पहले, ग्रामीणों ने सदियों पुरानी रस्म का निर्वहन करते हुए इंद्रावती नदी के तट पर एकत्रित होकर एक विशेष सेवा अर्जी का आयोजन किया।

इस पावन अवसर पर ग्रामीणों ने जल की देवी, जलनी आया को श्रद्धापूर्वक सोने की नाव और चांदी का पतवार भेंट की। इस अनोखी भेंट के साथ ही ग्रामीणों ने सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और बिना किसी विघ्न-बाधा के नया खानी त्यौहार को हर्षोल्लास के साथ मनाने के लिए जलनी आया से अनुमति मांगी। आस्था और परंपरा का अनूठा संगम बस्तर के जनजातीय समाज में कृषि और प्रकृति से जुड़े त्यौहारों का विशेष महत्व है। ‘नया खानी’ तिहार नई फसल के आने की खुशी में मनाया जाता है, जिसमें खेतों से आई नई फसल (धान) का भोग सबसे पहले देवी-देवताओं और पूर्वजों को लगाया जाता है।घाटकवाली गांव की मान्यता के अनुसार, इंद्रावती नदी और उनकी देवी ‘जलनी आया’ घाटकवाली की जीवनदायिनी हैं। ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि जलनी आया की अनुमति और आशीर्वाद के बिना कोई भी शुभ कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। यही कारण है कि पुरखों से चली आ रही परंपरा अनुसार सोने की नाव और चांदी का पतवार अर्पित कर जलनी आया को प्रसन्न किया गया, ताकि गांव पर उनका आशीर्वाद हमेशा बना रहे। पारंपरिक अनुष्ठान के दौरान गांव के बैगा, सिरहा, पुजारी और मांझी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण इंद्रावती नदी के घाट पर एकत्रित हुए। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच पूजा की रस्में पूरी की गईं। जलनी आया को भेंट अर्पित करने के बाद, बुजुर्गों और गांव माटी पुजारी ने सर्वजन के कल्याण, भरपूर अन्न-धन और ग्रामीणों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना की।इस रस्म के संपन्न होने के बाद अब पूरे घाटकवाली गांव में नया खानी तिहार बुधवार को मनाने के लिए जलनी आया से अनुमति मिलने के बाद मार्ग प्रशस्त हो गया है, जिसे लेकर ग्रामीणों में भारी उत्साह और उमंग का माहौल है। यह आयोजन बस्तर की उस अनमोल संस्कृति को दर्शाता है, जहां आज भी मनुष्य और प्रकृति के बीच का गहरा और पवित्र संबंध जीवित है। इस घाटजात्रा में गांव के माटी पुजारी मंगतू कश्यप, ग्राम पटेल लच्छू कश्यप, ग्राम सिरहा सीताराम और श्यामसुंदर कश्यप, कुलधर कश्यप, गिरधर कश्यप, लखेश्वर कश्यप, जुगल बघेल, सोनधर निषाद, सोनसाय मौर्य, संपत कश्यप के साथ साथ करंजी, भाटपाल, मरलेंगा, केसापुर, सुरीभाटा, किंजोली गांव के ग्रामीण उपस्थित रहे।
