फलीभूत हो उठी है मां शिरोमणि माथुर की आठ दशक की साधना



–अर्जुन झा-
दल्ली राजहरा। भगवान सबको सभी कुछ नहीं दे देते, कुछ न कुछ कमी बाकी रखते हैं, ताकि वह ईश्वर का दर्जा न प्राप्त कर ले। मगर सृष्टि के रचयिता परमपिता ने दल्ली राजहरा की धरा पर अपना एक साक्षात रूप जरूर भेज दिया है, वह भी सभी अच्छे गुणों से परिपूरित कर। इस मां में वो सारे सद्गुण हैं, जो दयालु परमपिता परमेश्वर में होते हैं। ममता की मूरत वो मां हैं डॉ. शिरोमणि माथुर। साहित्य जगत की महान विभूति, दल्ली राजहरा ही नहीं बल्कि समूचे छत्तीसगढ़ की शान, जिनकी ख्याति भारत ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार भी है। हमेशा शांतचित्त रहने वाली होठों से झरती ममतामयी मुस्कान वाली मां डॉ शिरोमणि माथुर 81 वर्ष की उम्र में भी साहित्य साधना और जनसेवा में उसी तरह लीन हैं जैसा की छह दशक पहले थीं। कॉलेज की पूर्व प्रोफेसर, आंगनबाड़ी की शुरुआत करने वाली, प्रौढ़ शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महान विभूति का नाम है डॉ. शिरोमणि माथुर।


आज मां शिरोमणि माथुर का 81वां जन्मदिन है। हमने अपने पाठकों के लिए उनसे जुड़ी खट्टी मीठी यादें यहां संग्रहित की हैं। मां कहती हैं- जीवन के इस अंतिम पड़ाव में भी मुझे किसी चीज की चिंता नहीं है। मुझे लगता है कि मैंने जो चाहा वह मुझे मिला, चाहे मेरा व्यक्तिगत जीवन हो या मेरी सामाजिक जीवन हो या साहित्यिक जीवन, मुझे पूरी तरह संतुष्टि है। समाज ने जो जरूरत से ज्यादा दिया है, इसके लिए मैं आभारी हूं। अपनी साहित्यिक यात्रा के संदर्भ में मां ने कहा- मन की भावनाओं को कोरे कागज पर उकेरना मेरी शुरू से आदत रही है। मैं बचपन में से लिखती आ रही हूं, बंगाली क्लब की पुस्तक में हर वर्ष नवरात्रि पर मेरा लेख छपता था। गगन सर मुझे प्रेरणा देते थे। बड़े बेटे के निधन के बाद मैं टूट गई और अपने आप को तन्हाई से दूर करने के लिए साहित्य को अपना लिया। ‘अर्पण’ पुस्तक के नाम से लेख प्रकाशित किया। उसके बाद कुछ युवाओं के आग्रह पर राजहरा के इतिहास को लिपिबद्ध किया। ट्रेड यूनियन, राजहरा का निर्माण, व्यापारी वर्ग, राजहरा कैसे बना, विकास कैसे हुआ, राजहरा की स्थापना के बारे में मैंने शोध ग्रंथ के रूप में लिखा। यहां की आदिवासी संस्कृति से प्रभावित रही हूं। यहां ट्रेड यूनियन की शुरुआत, शिक्षा की जानकारी पूरी लिपिबद्ध कर दी। मैंने माइंस से जो प्रदूषण होता है, आदिवासी कल्चर से छेड़छाड़ होती है, विकास अपने साथ बहुत कुछ अच्छाइयां लाता है तो कमियां भी लाता है, उन सब को लिपिबद्ध किया। इसलिए यह पुस्तक अपने आप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खनिज उत्खनन के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण मानी गई और इसी पुस्तक पर मुझे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और वर्ल्ड वाइड बुक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ. शिरोमणि माथुर ने बताया- मेरी सबसे प्रिय पुस्तक ‘मेरा दल्ली राजहरा’ है। मैं आध्यात्मिक रूचि वाली , इसलिए मैंने दोहों पर लिखना शुरू किया। अब तक 16,000 दोहे लिख चुकी हूं, जिनमें से 13,500 दोहे प्रकाशित हो चुके हैं, 2500 दोहे प्रकाशित होना बाकी हैं। ये सभी आध्यात्मिक दोहे हैं। मैं राजहरा को अपना घर समझती हूं, जिस तरह एक महिला अपने घर को सजाती है, वैसे ही शुरू से मेरी इच्छा रही कि राजहरा मेरा घर है। यहां के बच्चों के लिए आंगनबाड़ी नहीं थी, तब यहां के बच्चों को आंगनबाड़ी बनाकर ज्ञान दिया, प्रौढ़ शिक्षा के समय बहुत सारी सेवाएं दी, नगर के विकास में भी सेवाएं दी, जिससे ‘मेरा दल्ली राजहरा’ मुझे बहुत पसंद है।

शिक्षा और संस्कार जरूरी
महिला सशक्तिकरण को लेकर डॉ. शिरोमणि माथुर कहती हैं- हमने जिस जमाने में पढ़ाई की, उस जमाने में महिलाओं को नहीं पढ़ाते थे, लड़कों को ही पढ़ाते थे, लड़कियों को नहीं पढ़ाते थे। मेरा जन्म ग्रामीण परिवेश में हुआ, मां की रुचि थी, उसने हमें पढ़ाया और हमने भी दिल लगाकर पढ़ाई की। तब और आज के परिवेश में बहुत अंतर है। 1964 में मैंने ग्रेजुएशन की, उस समय मानसिक सोच अलग थी। आज के परिवेश में लड़कियों और परिवार की मानसिकताएं अलग हैं। भौतिकतावादी सोच के चक्कर में हम परिवार के बीच संतुलन नहीं बना पा रहे हैं। मेरा मानना है, महिलाओं को अपना घर सजाना चाहिए। पढ़ाई और संस्कार बहुत जरूरी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सब कुछ अधूरा है। हमारी बहन और बेटियों को अपने घरों में संतुलन बनाना चाहिए, अपने पति, अपने बच्चे, अपने घर परिवार सबके बीच संतुलित व्यवहार रखें, सबसे प्यार करें, प्यार के बिना सब कुछ अधूरा है। डॉ. माथुर अपनी लेखन यात्रा को लेकर कहती हैं- अब तक मैंने कई क्षेत्र में, लिखने के हर क्षेत्र में प्रयास किया है। कविताएं, कहानी, अब तक मेरे 7 दोहे संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, दो कहानी संग्रह, ‘मेरा दल्ली राजहरा’ और ‘अर्पण’ जैसे कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और 100 से अधिक पुस्तकों में मैं सह-लेखिका हूं और कई अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं छपती हैं।

नशे से बचें युवा
नशे की गर्त में जा रही युवा पीढ़ी को लेकर डॉ. शिरोमणि माथुर का कहना है- मेरा पूरा साहित्य इसी से जुड़ा है। हम जब तक इंसान न बन जाएं, तब तक हमारा जीवन सफल नहीं होता। अति भौतिकता और अति फैशन के चक्कर में हम और हमारी युवा पीढ़ी भटक रही है। मेरा बेटों और बेटियों से यही निवेदन है कि अपना घर, अपना परिवार पहले देखो और अपनी जिम्मेदारी समझो। अति भौतिकता और अति मित्रता के साथ दौड़ना और गलत लोगों की संगति का परिणाम बहुत ज्यादा खराब होता है। आज समाज भटक रहा है, हत्याएं, आत्महत्याएं हो रही हैं, लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे हैं, आपसी क्लेश बढ़ रहा है, यह शुभ संकेत नहीं है। मैं चाहती हूं कि लोग आपस में प्रेम से रहें, यही देखकर मेरा मन कभी-कभी बहुत दुखी हो जाता है। मैं चाहती हूं कि लोग आपस में मिलजुल कर रहें। राजहरा की पहचान खनिज से तो है ही, लेकिन यहां का प्रेम, यहां की वाणी, संदेश लोगों को खींचता रहा है। आज भी दल्ली राजहरा के लड़के यहां से बाहर जाते हैं तो दल्ली राजहरा से प्रेम करते हैं, वह अपने घरों की फोटो और यादों को मंगवाते हैं। आज राजहरा में जो प्रेम मिलता है, वह कहीं और नहीं मिलता। डॉ. माथुर ने हमारे पाठकों के लिए दोहा साझा किया
सदा दुआएं दीजिए, काम दुआएं आए, पैसे से ना मिलती दुआ, दुआ ना हाट बिकाय।

मेरी सांसों में बसा है राजहरा
दल्ली राजहरा से लोगों के लगाव के बारे में डॉ. शिरोमणि माथुर का कहना है- मैं राजहरा से बहुत प्रभावित हूं। लोग कहते हैं कि ‘शिरोमणि माथुर है तो राजहरा है और राजहरा है तो शिरोमणि माथुर है।’ मेरी हर रचना में दल्ली राजहरा जुड़ा है, मेरी हर कहानी में आपको दल्ली राजहरा का जिक्र अवश्य मिलेगा। मैं जीती हूं तो दल्ली राजहरा के लिए और मेरी हर सांसों में दल्ली राजहरा बसी है।

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