वोट चोरी एक व्यापक मुद्दा है, SIR समस्या का केवल एक हिस्सा है- चंदन कश्यप,पूर्व विधायक
जगदलपुर।
आज संभाग मुख्यालय राजीव भवन जगदलपुर में “वोट बचाओ देश बचाओ”अभियान के तहत प्रेसवार्ता का आयोजन किया गया जिसे पूर्व विधायक चंदन कश्यप नारायणपुर व कोंडागांव के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष देवचंद मतलम के द्वारा संबोधित किया गया..
इस प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए पूर्व विधायक चंदन कश्यप ने कहा वोट चोरी का मुद्दा केवल मौजूदा SIR प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। कांग्रेस ने कई चुनावों के दौरान मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने और हटाने, दोहरे पंजीकरण, चुनाव संबंधी आँकड़ों में पारदर्शिता, EVM और VVPAT की कार्यप्रणाली तथा चुनाव आयोग के आचरण पर लगातार सवाल उठाए हैं। मूल सवाल यह है कि क्या प्रत्येक पात्र नागरिक अपने संवैधानिक मताधिकार का प्रयोग कर सकता है और क्या चुनाव एक निष्पक्ष संस्था की निगरानी में कराए जा रहे हैं।
राहुल गांधी जी और कांग्रेस ने कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाने के लिए बार-बार निर्वाचन क्षेत्र के स्तर के आँकड़े और चुनावी तुलनाएँ सार्वजनिक की हैं। इसमें 7 फरवरी 2025 को महाराष्ट्र में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस, 7 अगस्त 2025 को महादेवपुरा से जुड़े आँकड़ों की प्रस्तुति, सितंबर 2025 में आलंद से जुड़े आरोप, नवंबर 2025 में हरियाणा से जुड़े आरोप और सितंबर 2026 में चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों के खुलासे के बाद उठाए गए नए सवाल शामिल हैं। इन प्रयासों को SIR से शुरू हुआ मुद्दा नहीं, बल्कि आँकड़ों, सार्वजनिक जाँच-पड़ताल और संस्थागत जवाबदेही के माध्यम से जवाब माँगने की एक निरंतर कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
7 फरवरी 2025 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने विपक्षी नेताओं सुप्रिया सुले और संजय राउत के साथ 2024 के लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बीच लगभग 39 लाख मतदाताओं के जुड़ने पर सवाल उठाए। इसके मुकाबले, पिछले पाँच वर्षों में लगभग 32 लाख मतदाता जुड़े थे। कांग्रेस ने माँग की कि बताया जाए कि ये अतिरिक्त मतदाता कौन थे, उनका पंजीकरण कब हुआ और इतने कम समय में संख्या में इतनी तेज़ वृद्धि क्यों हुई। इस अंतर के आधार पर पारदर्शी और मशीन-पठनीय मतदाता आँकड़े उपलब्ध कराने की माँग की गई। केवल मतदाताओं की संख्या में वृद्धि अपने आप में यह साबित नहीं करती कि अतिरिक्त पंजीकरण फर्जी थे।
7 अगस्त 2025 को राहुल गांधी ने बेंगलुरु सेंट्रल के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया कि पाँच प्रकार की अनियमितताओं के कारण 1,00,250 वोट प्रभावित हुए। इनमें दोहरा पंजीकरण, अमान्य या संदिग्ध तस्वीरें, फॉर्म 6 का दुरुपयोग और अन्य संदिग्ध प्रविष्टियाँ शामिल थीं। उन्होंने कहा कि इन निष्कर्षों के आधार पर मतदाता सूची की शुद्धता की व्यापक जाँच होनी चाहिए। इन आँकड़ों को कांग्रेस के आरोपों और विश्लेषण के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जब तक किसी आधिकारिक या न्यायिक निष्कर्ष से इनकी स्वतंत्र पुष्टि न हो जाए।
इसके बाद कांग्रेस ने हरियाणा में दोहरे मतदाताओं और मतदाता सूची की संदिग्ध प्रविष्टियों तथा कर्नाटक के आलंद में नाम हटाने के कथित प्रयासों को लेकर सवाल उठाए। राहल गांधी ने ऐसे सॉफ़्टवेयर टूल के कथित रूप से बंद किए जाने पर भी सवाल किया, जिसका उद्देश्य तस्वीरों और जनसांख्यिकीय विवरणों में समानता के आधार पर संदिग्ध मतदाता प्रविष्टियों की पहचान करना था। कांग्रेस की माँग स्पष्ट रही है: मूल आँकड़े उपयोग योग्य डिजिटल प्रारूप में उपलब्ध कराए जाएँ, नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया का खुलासा हो और राजनीतिक दलों तथा नागरिकों को केवल आश्वासनों पर निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र रूप से सत्यापन करने का अवसर मिले।
25 सितंबर 2026 को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक अहम पड़ताल में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग दस महीनों के दौरान कम-से-कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्तियाँ दर्ज कराईं। इनमें फॉर्म 6 से जुड़ी आपत्तियाँ भी शामिल थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध ऐसे फैसलों से था जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए, मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुँच, मतदाता आँकड़ों के केंद्रीकरण और प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ़्टवेयर की विश्वसनीयता से जुड़ी चिंताओं से था। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल कथित तौर पर उसके अपने तीन में से दो आयुक्तों ने उठाए थे।
रिपोर्ट के अनुसार, जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में रिपोर्ट तैयार किए जाने तक SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी या जिस चरण को रिपोर्ट में शामिल किया गया था, वहाँ 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। पश्चिम बंगाल में तार्किक विसंगतियों के आधार पर चिह्नित लगभग 60 लाख मतदाताओं के मामलों के निपटारे में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया। रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद लगभग 27 लाख नाम हटाए गए, जबकि न्यायाधिकरणों के समक्ष अपीलों की संख्या लगभग 38 लाख तक पहुँच गई थी। इन आँकड़ों को अलग-अलग चरणों और श्रेणियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है: प्रारूप सूची से हटाए गए नाम, अंतिम रूप से हटाए गए नाम और लंबित अपीलें एक-दूसरे के समान नहीं हैं।
जब भी कांग्रेस ने चुनावी अनियमितताओं पर सवाल उठाए, राजनीतिक प्रतिक्रिया में आरोपों को खारिज करने, साक्ष्यों पर सवाल उठाने या राहुल गांधी से अपने दावों को प्रमाणित करने की माँग करने पर जोर दिया गया। महादेवपुरा विवाद में कर्नाटक के चुनाव अधिकारियों ने विशिष्ट विवरण और हस्ताक्षरित घोषणा-पत्र माँगा। चुनाव आयोग ने भी इस दावे को खारिज किया कि ऑनलाइन नाम हटाने के अनुरोधों के आधार पर उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। जिला स्तर की ब्रीफिंग में BJP की राजनीतिक प्रतिक्रियाओं, चुनाव आयोग के औपचारिक जवाबों और मूल आँकड़ों से जुड़े अनुत्तरित सवालों के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाना चाहिए।
द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल से आयोग के भीतर पारदर्शिता और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। हालाँकि, चुनाव आयोग ने इस धारणा को खारिज किया कि सामने आए मतभेद उसकी कार्यप्रणाली के ठप हो जाने का प्रमाण हैं। आयोग का कहना था कि विचारों में अंतर और टिप्पणियाँ सामान्य हैं तथा SIR से जुड़े फैसलों को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई थी। इसलिए कांग्रेस को केवल सामने आए मतभेदों को चुनावी गड़बड़ी का निर्णायक प्रमाण मानने के बजाय संबंधित रिकॉर्ड, दर्ज की गई आपत्तियों, उनके जवाबों और लिए गए फैसलों को सार्वजनिक करने की माँग करनी चाहिए।
ज्ञानेश कुमारः संस्थागत जवाबदेही का सवाल-इस विवाद का केंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी बन गए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि आयोग ने इस तरह काम किया है जिससे उसकी स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वसनीयता कमजोर हुई है। सितंबर 2026 की पड़ताल के बाद राहुल गांधी ने RSS-BJP और चुनाव आयोग पर अपने आरोप दोहराए, जबकि कांग्रेस नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और व्यापक जाँच की माँग की। मतदाताओं के सामने मूल सवाल यह है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार संवैधानिक संस्था क्या पूरी पारदर्शिता बरत रही है और मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़े गंभीर सवालों का स्वतंत्र रूप से जवाब दे रही है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले 2023 के कानून ने सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के फैसले में निर्धारित चयन व्यवस्था को बदल दिया। पहले की अंतरिम व्यवस्था के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे। 2023 के कानून के तहत मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। कांग्रेस का तर्क है कि इस बदलाव से सरकार को ऐसी संस्था की नियुक्तियों पर अधिक प्रभाव मिल जाता है, जिसे स्वतंत्र रूप से सरकार के चुनावी आचरण की जाँच करनी चाहिए।
इसी कानून के तहत धारा 16 लागू की गई, जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के पद पर रहे किसी व्यक्ति के आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए या किए जाने का दावा किए गए कार्यों के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाती है। कांग्रेस ने इस प्रावधान की आलोचना करते हुए कहा है कि यह आजीवन संरक्षण प्रदान करता है और जवाबदेही को कमजोर करता है। हालाँकि, सटीकता के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह प्रावधान आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े कार्यों पर लागू होता है; इसे हर प्रकार की कार्रवाई या अपराध के लिए पूर्ण छूट नहीं बताया जाना चाहिए। कांग्रेस की राजनीतिक माँग यह है कि चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले सुरक्षा उपाय हों, लेकिन वैध आधिकारिक आचरण को सार्थक जवाबदेही से पूरी तरह बाहर न रखा जाए।
पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष देवचंद मतलाम ने प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए कहा कांग्रेस का अभियान अब प्रेस कॉन्फ्रेंस और संसद में उठाए गए सवालों से आगे बढ़ चुका है। AICC के परिपत्र में 2 से 8 अक्टूबर 2026 तक “लोकतंत्र बचाओ सप्ताह” आयोजित करने, इसके बाद ब्लॉक स्तर पर मार्च और रैलियाँ निकालने, दशहरे के दौरान जनसंपर्क करने तथा “वोट बचाओ देश बचाओ” अभियान चलाने का उल्लेख है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य चुनावी निष्पक्षता से जुड़े सवालों को देशव्यापी जनआंदोलन में बदलना है। इसके तहत ज़िला इकाइयों को स्थानीय शिकायतों का दस्तावेज़ीकरण करने और नागरिकों को उनके मताधिकार की रक्षा के लिए संगठित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
अक्टूबर की शुरुआत में INDIA गठबंधन के सांसदों और नेताओं ने दिल्ली की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। चुनाव आयोग की ओर मार्च करते समय पुलिस बैरिकेडिंग के कारण उन्हें रोक दिया गया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने आकाशवाणी भवन के पास अचानक धरना दिया। इसके बाद विंडसर प्लेस के निकट विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं का जमावड़ा हुआ तथा राजघाट पर मौन प्रदर्शन किया गया। 9 अक्टूबर को INDIA गठबंधन के एक प्रतिनिधिमंडल नै राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की और मुख्य चुनाव आयुक्त, 2023 के कानून, SIR तथा चुनावी निष्पक्षता से जुड़ी चिंताओं पर ज्ञापन सौंपा।
व्यापक विरोध प्रदर्शनों में नागरिक समाज के संगठनों और छात्र कार्यकर्ताओं की भागीदारी भी रही। इनमें न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान (CJAR) तथा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) द्वारा आयोजित प्रदर्शन शामिल थे। इन कार्रवाइयों ने चुनाव आयोग के भीतर सामने आई कथित आपत्तियों, मतदाताओं के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया और स्वतंत्र जाँच की माँग पर अधिक ध्यान आकर्षित किया। ज़िला कांग्रेस इकाइयों को इन प्रदर्शनों को व्यापक लोकतांत्रिक बहस के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, साथ ही कांग्रेस के अपने संगठनात्मक अभियान और उसकी माँगों को स्पष्ट रूप से अलग पहचान देनी चाहिए।
AICC के परिपत्र में “वोट बचाओ देश बचाओ” अभियान के अगले चरणों का उल्लेख है। इनमें 25 अक्टूबर को ज़िला और राज्य स्तर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस, “वोट रक्षक” के माध्यम से बूथ स्तर पर मतदाता सूची का सत्यापन, 25 अक्टूबर से 25 नवंबर तक गाँवों में चौपालें और 1 नवंबर को रामलीला मैदान में INDIA गठबंधन के सहयोगियों के साथ एक विशाल राष्ट्रीय रैली शामिल है। इसके अतिरिक्त, “दिल्ली चलो” कार्यक्रम के तहत विभिन्न राज्यों से यात्राएँ निकालकर 25-26 नवंबर को दिल्ली पहुँचने का आह्वान किया गया है। प्रत्येक ज़िला प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता प्रभावित मतदाताओं की पहचान कैसे करेंगे, मामलों का दस्तावेज़ीकरण कैसे करेंगे और नागरिकों को नाम में सुधार या अपील की प्रक्रिया में किस प्रकार सहायता देंगे।
कांग्रेस की माँगें
29 सितंबर 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) द्वारा अपनाया गया रुख पार्टी की एकजूट माँगों का आधार है। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, SIR को स्थगित करने, मतदाता सूचियों से हटाए गए उन 13.3 करोड़ नामों को बहाल करने की माँग की है जिन्हें हटाए जाने का आरोप पार्टी ने लगाया है, और गंभीर विसंगतियों की स्वतंत्र तथा समयबद्ध जाँच कराने की माँग की है। पार्टी ने कथित व्यापक साज़िश को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की भी माँग की है। ये कांग्रेस की घोषित राजनीतिक माँगें हैं। बहाल किए जाने वाले नामों की संख्या का उल्लेख करते समय इसे कांग्रेस की माँग के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि नामों को गलत तरीके से हटाए जाने के किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में।
कांग्रेस ने मतदाता सूचियों में किए गए बड़े बदलावों का पूरा विवरण सार्वजनिक करने, राजनीतिक दलों को समय पर सरल और उपयोगी प्रारूप में मतदाता आँकड़े उपलब्ध कराने तथा जिन मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं, उन्हें इसकी स्पष्ट जानकारी देने की माँग भी की है। प्रत्येक प्रभावित नागरिक को अपने नाम हटाए जाने के फैसले को चुनौती देने और नाम बहाल कराने का सार्थक अवसर मिलना चाहिए। जहाँ गंभीर विसंगतियों के साक्ष्य सामने आएँ, वहाँ स्वतंत्र और समयबद्ध जाँच कराई जानी चाहिए।
कांग्रेस की व्यापक माँग ऐसे चुनाव आयोग की है जो सत्तारूढ़ दल से स्वतंत्र हो और जिसे पूरे राजनीतिक परिदृश्य में जनता का विश्वास प्राप्त हो। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की व्यवस्था पर पुनर्विचार, चुनाव आयुक्तों को दिए गए कानूनी संरक्षण की समीक्षा और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को पारदर्शी, ऑडिट योग्य तथा जाँच-पड़ताल के लिए खुला बनाना शामिल है। उद्देश्य केवल मौजूदा SIR विवाद का समाधान करना नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बहाल करना है।
इस प्रेसवार्ता में मुख्य रूप से शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुशील मौर्य, ग्रामीण अध्यक्ष प्रेमशंकर शुक्ला,पूर्व विधायक रेखचंद जैन,महामंत्री अभिषेक नायडू,सुभाष गुलाटी,रविशंकर तिवारी, ब्लॉक अध्यक्ष बलराम यादव,बालेश दुबे,सुनीता सिंह आदि मौजूद रहे।
