रपटीली राहें और पथरीली जिंदगानी, पथरली पारा की यही कहानी


छिंदगांव पंचायत की इस बस्ती में आज तक नहीं बन पाई है सड़क

बकावंड (अर्जुन झा ):- बस्ती का जैसा नाम वैसी ही ही किस्मत भी है, वहां के बाशिंदों की। रपटीली राहें और पथरीली जिंदगानी, यही तो है पथरीली पारा के अभागे ग्रामीणों की कहानी। आजादी के करीब अस्सी दशक बाद भी अपाहिज सिस्टम ने ग्रामीणों को सड़क, पानी, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के मोहताज बनाकर रख दिया है।
बकावंड ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम पंचायत छिदगांव -2 की पथरली पारा बस्ती में न जाने कितने विधायक आए और चले गए, मगर किसी भी विधायक ने बस्ती के ग्रामीणों के दुख दर्द को समझने की जरूरत ही नहीं समझी। पथरली पारा के ग्रामीणों के वोटों के दम पर कई सरपंच छिंदगांव -2 पंचायत में चुने गए। कई सचिव नियुक्त हुए, सालों काम करते हुए रिटायर हो गए या फिर तबादले के बाद दूसरी पंचायत में चले गए, मगर किसी भी सरपंच या सचिव ने पथरीली पारा का उद्धार करने की जहमत नहीं उठाई। आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी गांव का विकास थमा हुआ है। छिंदगांव की पथरली पारा बस्ती के बाशिंदे आज भी सड़क सुविधा के लिए तरस रहे हैं। उन्हें शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो रहा है। बिजली, शिक्षा, चिकित्सा जैसी अन्य सुविधाओं का भी अभाव इस बस्ती में बना हुआ है। गांव के ग्रामीण कई बार ग्राम पंचायत छिंदगांव -2 और जनपद पंचायत बकावंड में आवेदन देकर सड़क, पानी, शिक्षा, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था करने की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन उनकी फरियाद सुनने को कोई तैयार नहीं है। छिंदगांव ग्राम पंचायत और पथरली पारा बस्ती बस्तर विधानसभा क्षेत्र में आते हैं। मौजूदा विधायक लखेश्वर बघेल को भी यहां के ग्रामीण कई बार आवेदन सौंप चुके हैं। विधायक भी कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। आज तक एक सड़क भी इस गांव में बनाई नहीं जा सकी है। सड़क के नाम पर पथरीली और रपटीली जमीन भर है। इसी उबड़ खाबड़, रपटीली और पथरीली सड़क से ग्रामीण हपटते – गिरते आवागमन करते हैं। यह सड़क कम नाला ज्यादा नजर आता है। बरसात के मौसम में यह तथाकथित सड़क नाले की शक्ल ले लेती है और तब ग्रामीणों का गुजरना तक मुश्किल हो जाता है। पथरीली पारा के ग्रामीणों को मजबूर होकर पथरले रास्ते पर चलना और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों को काफी दिक्कत हो रही है और कष्ट सहना पड़ रहा है। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं विभागीय अधिकारी आंख बंद किए बैठे हुए हैं। सरपंच बालेश्वर कश्यप और सचिव सुकदेई भारती भी कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं।

बीमारों का भगवान ही मालिक
पथरली पारा की सड़क पर चलना हंसी मजाक नहीं है। साईकिल और मोटर साईकिल तो इस खतरनाक रास्ते पर हरगिज चलाई नहीं जा सकती। जो लोग ऐसा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें अपने दांत, हाथ – पैर तुड़वाने पड़ जाते हैं और अक्सर उनकी जान पर भी बन आती है। अगर गांव का कोई व्यक्ति, बुजुर्ग या बच्चा बीमार पड़ जाए, तो उसे इलाज के लिए खाट पर रखकर अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। इसी तरह प्रसव वेदना झेल रही गर्भवती महिला को भी प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचाने हेतु खाट का ही सहारा लेना पड़ता है। इस दौरान हिचकोले लगने से बीमार शख्स और गर्भवती महिला की हालत और भी बिगड़ जाती है। सड़क न होने के कारण बस्ती तक एंबुलेंस पहुंच ही नहीं पाती। महतारी एक्सप्रेस, 108 एंबुलेंस सेवा पथरली पारा के ग्रामीणों के लिए बेमानी हो गई है।

इस ‘अहिल्या’ को ‘राम’ का इंतजार
पति के श्राप से पत्थर बन चुकी देवी अहिल्या का तो भगवान श्रीराम ने उद्धार कर दिया था, मगर अहिल्या सदृश पथरली पारा का उद्धार कौन करेगा? यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या बड़ी ही रुपवती थी। देवराज इंद्र उस पर मोहित हो उठे। इंद्र एकबार गौतम ऋषि का भेष धरकर उसके आश्रम में पहुंच गए और अहिल्या को अपने बाहुपाश में जकड़ने की कोशिश करने लगे। इसी बीच गौतम ऋषि आ पहुंचे और अपनी पत्नी को दूसरे के बाहुपाश में देख क्रोधित हो उठे। ऋषि ने अहिल्या को श्राप दे दिया कि वह पत्थर का शिलाखंड बन जाए। अहिल्या रोती गिड़गिड़ाती रही मगर गौतम ऋषि ने श्राप वापस नहीं लिया। ऋषि ने इतना उपकार जरूर किया कि शिलाखंड पर जब भगवान राम के चरण पड़ेंगे, तभी अहिल्या का उद्धार हो पाएगा। वनवास के दौरान उसी जंगल से गुजर रहे भगवान राम के पैर उसी शिलाखंड पर पड़ गए और तब अहिल्या को उसका वास्तविक रूप वापस मिल सका। अहिल्या का उद्धार तो भगवान राम के चरण पड़ने से हो गया, मगर अनेक विधायकों, सरपंचों के चरण पथरली पारा में पड़ने के बाद भी इस बस्ती का उद्धार नहीं हो सका है। बस्ती के ग्रामीण किसी तारणहार का इंतजार पथरीली पड़ चुकी आंखों से आज तक कर रहे हैं।

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