गोलियों और बमों के धमाकों की जगह ली लोकगीतों की स्वर लहरियों ने
-अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर की धरती पर अब बम बंदूकों के धमाकों की गूंज नहीं, बस्तरिहा माता बहनों के होठों से फूटती लोकगीतों की स्वर लहरियां सुनाई देने लगी हैं। ये स्वर लहरियां दिल की गहराइयों में उतर जाती हैं, दिल को सुकून देती हैं, रोम रोम को हर्षित कर देती हैं। मानसून की रफ्तार के साथ बस्तर में धान की रोपाई तेज गति से चल रही है। किसान आल्हादित हैं, किसान परिवारों की बहन बेटियां उल्लसित हैं, मजदूर भी आनंदित नजर आ रही हैं। खुशियों का यह समावेश बस्तर के खेतों और जंगलों में सुमधुर लोकगीतों के रूप में परिलाक्षित हो रहा है।
नक्सली लाल आतंक के साये से मुक्त हो चुके बस्तर के लोग अब पुरसुकून जिंदगी जीने लगे हैं, हर पल मौत की आहट पहले लोगों के दिलों की धड़कन बढ़ जाया करती थी। केंद्र की मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन ने बस्तर के जन जीवन में नई बहार ला दी है। यहां के लोग अब भय और चिंताओं से मुक्त होकर न सिर्फ चैन की नींद ले पा रहे हैं, बल्कि खेत खलिहानों और जंगलों में भी उन्मुक्त होकर दिनचर्या के काम निपटा रहे हैं। बस्तर में उद्योग नहीं हैं, लिहाजा खेत और जंगल ही उनकी रोजी रोजगार का जरिया हैं। खेतों से निकलने वाली फसल और जंगलों में मिलने वाली वनोपजों के सहारे ही बस्तर के लोगों की आजीविका चलती है। 31 मार्च 2026 के पहले तक यहां के लोग बेफिक्र होकर अपने खेतों और जंगलों में नहीं जा पाते थे। अब वह काला अध्याय खत्म हो चुका है। बस्तर की जीवनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है। बस्तर के जिन लोकगीतों को सुनने के लिए कान तरस जाया करते थे, वही लोकगीत अब हर दस कदम के फासले पर सुनाई देने लगे हैं। ऐसा ही एक दिल को छू लेने वाली लोकगीतों की धुन हमें बस्तर विकासखंड के ग्राम मधोता-2 के खैरगुड़ा में सुनाई दी। यहां धान रोपाई का काम पूरे जोर शोर से चल रहा है। इस बार खेतों में सुबह से शाम तक महिलाओं की टोलियां नजर आ रही हैं। नंगे पांव कीचड़ में उतरकर ये महिलाएं धान के पौधे रोप रही हैं और रोपाई के दौरान उनके द्वारा गाए जाने वाले ददरिया व जगार गीत की गूंज से खेत सांस्कृतिक रंग में डूबे नजर आ रहे हैं। खैरगुड़ा में धान रोपाई केवल खेती का काम नहीं रह गई है, बल्कि यह सामूहिक सहयोग और लोक परंपरा का जीवंत उदाहरण भी है। महिलाएं समूह बनाकर पहले नर्सरी से धान के पौधे उखाड़ती हैं, फिर उसकी गड्डियां तैयार कर कतारबद्ध तरीके से खेतों में रोपाई करती हैं। इस दौरान बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को खेती की पारंपरिक तकनीकों के साथ-साथ लोकगीतों की विरासत भी सिखा रही हैं।गांव की महिलाएं घरेलू काम निपटाने के बाद टिफिन लेकर खेतों की ओर निकल जाती हैं। दोपहर में थोड़ा विश्राम कर फिर देर शाम तक रोपाई चलती है। कई महिलाएं अपने छोटे बच्चों को भी साथ लेकर आती हैं जो खेत की मेड़ पर खेलते रहते हैं। गांव में आज भी “पहले एक किसान के खेत में, फिर दूसरे के खेत में” वाली सामूहिक श्रम की परंपरा कायम है। इससे कम समय में सभी के खेतों की रोपाई पूरी हो जाती है। दोपहर के समय सभी महिलाएं एक साथ बैठकर भोजन करती हैं जिससे आपसी भाईचारा और मजबूत होता है। खैरगुड़ा की किसान मंदना ठाकुर ने बताया कि समय पर धान रोपाई होना पूरे साल की आजीविका और खाद्यान्न सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी है। उनके अनुसार पुरुष जोताई और सिंचाई का काम संभालते हैं जबकि रोपाई की सबसे बड़ी जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है। खैरगुड़ा की महिलाएं रोपाई में दक्ष मानी जाती हैं। उन्हें पौधे की उचित गहराई और दूरी का वर्षों का अनुभव है जिससे अच्छी उपज मिलती है। गांव की कई महिलाएं पिछले तीन दशकों से लगातार इस काम से जुड़ी हैं। अब युवा पीढ़ी की लड़कियां भी मां और दादी के साथ खेतों में उतर रही हैं। प्रिया बघेल, कुसुमलता, सत्यबती, सुंदरी बाई का कहना है कि लोकगीत गाते हुए काम करने से थकान महसूस नहीं होती और पूरा दिन आनंद से बीत जाता है। बस्तर की कृषि व्यवस्था आज भी महिलाओं और पुरुषों की संयुक्त मेहनत, अनुभव और परंपरागत ज्ञान पर आधारित है। खैरगुड़ा की महिलाएं अपनी मेहनत और समर्पण के जरिए यह संदेश दे रही हैं कि खेती सिर्फ रोजी-रोटी का साधन नहीं है, बल्कि यह बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता की मजबूत नींव भी है।
