नशा मुक्ति शिविरों पर सवाल: गांव-गांव बिक रहा गुटखा, गुड़ाखू और शराब, कैसे बनेगा नशामुक्त बस्तर -बुधराम नेताम
बकावंड। बस्तर जिले में नशे के खिलाफ जागरूकता और नशा मुक्ति शिविरों का आयोजन लगातार किया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर उतना दिखाई नहीं दे रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई दुकानों पर तंबाकू, गुटखा, गुड़ाखू और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री की शिकायतें सामने आती रहती हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध रहेंगे, तो नशामुक्ति अभियान कितना प्रभावी हो पाएगा?

स्थानीय लोगों का कहना है कि नशा छोड़ने की अपील करने से पहले नशीले पदार्थों की उपलब्धता पर रोक लगाना जरूरी है। गांवों में छोटी-बड़ी दुकानों पर यदि गुटखा, तंबाकू और गुड़ाखू आसानी से मिलता रहेगा तो विशेषकर युवा वर्ग इसकी चपेट में आता रहेगा। वहीं शराब की उपलब्धता और सेवन को लेकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बनी हुई है।
युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा प्रभावित
आज के समय में युवा एक-दूसरे को देखकर नशे की शुरुआत कर रहे हैं। शुरुआत अक्सर तंबाकू, गुटखा या गुड़ाखू से होती है और धीरे-धीरे कई युवा अन्य नशीले पदार्थों की ओर बढ़ जाते हैं। इसका असर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पारिवारिक जीवन पर पड़ रहा है।
नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का कहना है कि नशा मुक्ति केवल शिविर लगाने से संभव नहीं होगी। इसके लिए नशीले पदार्थों की बिक्री और उपलब्धता पर भी प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।
पहले बिक्री पर लगे रोक, फिर सार्थक होगा अभियान
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और संबंधित विभाग यदि वास्तव में बस्तर को नशामुक्त बनाने की दिशा में गंभीर हैं, तो गांव-गांव दुकानों की जांच कर नशीले पदार्थों की बिक्री पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि युवाओं तक नशीले पदार्थों की आसान पहुंच खत्म हो सके।
बुधराम नेताम ने सरकार और प्रशासन से अपील की है कि एक बार नशीले पदार्थों की बिक्री पर प्रभावी तरीके से रोक लगाकर देखें। उनका कहना है कि यदि गांवों में नशे की उपलब्धता कम होगी तो बड़ी संख्या में युवाओं का भविष्य बचाया जा सकता है। नशे की गिरफ्त से युवा पीढ़ी को बाहर निकालना ही बस्तर के विकास की मजबूत नींव बन सकता है।
