कल का मंदिवाड़ा ग्राम आज की सांस्कृतिक नगरी है मद्देड़
(आंचलिक लेखक/कवि बीरा राजबाबू ‘प्रखर’ की कलम से)
बीजापुर :- मद्देड़ बीजापुर जिले का एक ऐसा गांव जो बस्तर के राजाओं के इतिहास काल से अब तक सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है । मद्देड टाऊन का राजस्व अभिलेख 1910 से उपलब्ध हैं । इसका अर्थ यह है कि हमारे देश की आजादी के पूर्व से बसा यह ग्राम भोपालपटनम जमींदारी में महत्वपूर्ण भूमिका में रहा। भोपालपटनम जमींदारी में मद्देड़ एकमात्र गांव रहा जो व्यापारिक और राजनैतिक दृष्टिकोण से संपन्न रहा।
भोपालपटनम क्षेत्र के नामचीन साहित्यकार दादा जोकाल जब अपनी युवा अवस्था में थे तब ग्राम के ही संभ्रांत और बुद्धिमान व्यक्ति कासोजी लक्ष्मीनारायण जी से उत्सुकता वश इसके मद्देड़ होने के पीछे कारण को पूछा तब उन्होने इसके इतिहास को बताया । दादा जोकाल ने इस ऐतिहासिक विरासत को मुझ नाचीज को हस्तांतरित किया है जिसे भावी पीढ़ी को सौंप रहा हूँ । दादा के बताए अनुसार इस ग्राम का नाम मद्देड़ होने के पीछे यह इतिहास है की इसे भोपालपटनम जमींदार द्वारा विभिन्न जातियों के समूह को लाकर यहां व्यवस्थित रूप से बसाया गया । चूँकि भोपालपटनम जमींदारी सीमा पूर्व आंध्रप्रदेश से लगा होने के कारण तेलगूभाषी क्षेत्र है इसलिए इसे मंदिवाडा नाम दिया गया। मंदीवाडा एक तेलगू भाषी शब्द है जिसका सन्धि विच्छेद करने पर मंदी का अर्थ लोग, भीड़ या जन समूह और वाडा का अर्थ पारा, टोला, मोहल्ला होता है । विभिन्न जातियों के समूह या भीड़ का मोहल्ला नाम का मंदिवाडा ग्राम कालांतर में मद्देड़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जातियों के अनुसार इस ग्राम को विभिन्न समूह मे बसाया गया है जो ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। मद्देड़ में बसाए गए जातियों का उल्लेख करें तो हाथ पैरों की उंगलियां कम पड़ जायेंगी। जैसे की- बनिया, मारवाडी, ब्राह्मण, कुन्बी, दर्जी, लोहार, सोनार, कमार, मोची, महार, घसिया, घोबी, नाई, कुम्हार, बुनकर, सालेवार, भोई, गोंड, परधान, मरार, कलार, जुलाह, मुसलमान,आदि जाति प्रमुख हैं । इस प्रकार विभिन्न जातियों और संस्कृतियों का संगम है मद्देड़ जिस कारण इसे भोपालपटनम जमींदारी की सांस्कृतिक विरासत वाली नगरी कहें तो कोई अतिसयोक्ती नही होगी।
