वन विभाग ने काजू की खेती पर लगा दिया ग्रहण
–अर्जुन झा-
बकावंड। वन विभाग की अड़ंगेबाजी से शासन की एक महत्वकांक्षी योजना पर ग्रहण लग गया है। इससे यहां के ग्रामीणों की आजीविका पर भी संकट खड़ा हो गया है।
मामला बस्तर वन मंडल के करपावंड वन परिक्षेत्र से जुड़ा हुआ है। वन विभाग की आपत्ति के कारण से सतोषा-मैलबेड़ा के ग्रामीणों की आजीविका पर संकट आ गया है और वन विकास निगम का रोपण कार्य ठप हो गया है। बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सतोषा व मैलबेड़ा में काजू पौधा रोपण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। वन विकास निगम जगदलपुर द्वारा 24 जून 2025 से शुरू किए गए काजू रोपण कार्य को करपावंड वन परिक्षेत्र के अधिकारी कर्मचारियों द्वारा रोक दिए जाने से ग्रामीणों की आजीविका पर संकट मंडराने लगा है। ग्रामीणों ने बताया है कि शासन द्वारा वन विकास निगम के माध्यम से ग्राम केंदूगुड़ा में 25.22 हेक्टेयर और मैलबेड़ा में 10 हेक्टेयर शासकीय भूमि पर काजू पौधरोपण की योजना शुरू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य बस्तर में काजू की पैदावार कर यहां के लोगों को रोजगार से जोड़ना था। काजू रोपण से जुड़ा कार्य का 60 प्रतिशत हो चुका है। जमीन की सफाई व गड्ढा खुदाई कार्य पूर्ण हो चुकी है और अच्छे किस्म के काजू पौधे स्थल पर लाकर रखे जा चुके हैं। बावजूद इसके करपावंड वन विभाग ने 19 जुलाई को रोपण कार्य पर यह कहते हुए आपत्ति जता दी कि यह भूमि वन विभाग की है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि यह भूमि वन विभाग की है तो कार्य प्रारंभ होने के 25 दिनों तक विभाग के कर्मचारी कहां सो रहे थे? कार्य के प्रारंभ में ही आपत्ति क्यों नहीं जताई गई? इससे विभागीय निष्क्रियता और कार्य में बाधा डालने की मंशा स्पष्ट होती है। ग्रामीणों का कहना है कि इस विवाद के चलते जहां एक ओर रोपण स्थल में रखे काजू पौधों के खराब होने का खतरा बढ़ गया है, वहीं दूसरी ओर सैकड़ों ग्रामीणों का रोजगार भी प्रभावित हो रहा है। ग्राम पंचायत सतोषा व मैलबेड़ा सहित समस्त ग्रामीणों ने इस कार्य में कोई आपत्ति नहीं जताई है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि विभागीय समन्वय स्थापित कर तत्काल रोपण कार्य को पुनः प्रारंभ कराया जाए, ताकि पौधे खराब होने से बचाए जा सकें और ग्रामीणों को रोजगार का अवसर मिल सके। संलग्न दस्तावेजों में खसरा नक्शा व ग्राम पंचायत के प्रस्तावों की प्रतिलिपि भी शामिल की गई है, जिससे स्पष्ट है कि उक्त भूमि शासकीय है। ग्रामीणों ने इस मुद्दे पर उच्च अधिकारियों के हस्तक्षेप की मांग की है।
