जल जीवन मिशन के फूंक डाले 84 लाख, ग्रामीणों को नहीं मिला एक बूंद पानी!



अर्जुन झा-
बकावंड। केंद्र सरकार द्वारा संचालित जल जीवन मिशन को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने कमाई का बड़ा जरिया बना लिया है। अधिकारी और ठेकेदार काम आधा अधूरा कराते हैं और फाइलों में कार्य पूर्ण दर्शा कर पूरी स्वीकृत राशि निकाल लेते हैं। इसका बड़ा उदाहरण विकासखंड बकावंड की ग्राम पंचायत मैलबेड़ा से सामने आया है। यहां जल जीवन मिशन के कार्य के नाम पर में 84.25 लाख रुपए फूंक डाले गए, मगर ढाई साल बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों को आज तक एक बूंद पानी नहीं मिल पाया है।


ग्राम मैलबेड़ा में सिंगल विलेज स्कीम और जल जीवन मिशन के तहत वर्ष 2023 में पेयजल व्यवस्था के लिए 84.25 लाख रुपए स्वीकृत हुए थे। इस राशि से गांव में 50 किलो लीटर क्षमता वाली 12 वर्ग मीटर की टंकी निर्माण, 4957 मीटर पाईप लाइन बिछाने, 230 नल कनेक्शन देने, बाउंड्रीवॉल, क्लोरिन रूम और स्विच रूम निर्माण के कार्य प्रस्तावित थे। इसका ठेका रायपुर के फर्म ए जे वेंचर को दिया गया था। इसका कार्यादेश 29 मई 2023 को जारी हुआ था। ढाई साल बीत चुका है, लेकिन आज तक टंकी में पानी नहीं भरा जा सका है। पाइप लाइन आधी अधूरी बिछाई गई है, अधिकांश घरों में नल कनेक्शन नहीं लगाए गए हैं, टंकी सूखी पड़ी है और ग्रामीण प्यासे मर रहे हैं। टंकी परिसर में बिना दरवाजे का एक कमरा जरूर नजर आ रहा है, जो संभवतः स्विच रूम होगा, मगर जल शुद्धिकरण के लिए क्लोरिन रूम का अता पता नहीं है। जब जल ही नहीं है, तो उसका शुद्धिकरण कैसे? यह है विभागीय लापरवाही की असली तस्वीर। ग्रामीणों का कहना है कि काम पूरा होने के बाद भी ठेकेदार ने पाइप लाइन नहीं डाली, और जल जीवन मिशन को अमलीजामा पहनाने वाले विभाग पीएचई के अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं। सरकारी फाइलों में योजना पूर्ण दिखाई जा रही है, लेकिन ज़मीन पर हालात बिलकुल उलटे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि कई बार शिकायत करने के बाद भी कोई अधिकारी मौके पर नहीं आए। 84.25 लाख की योजना अब ‘पानी’ देने की जगह खुद धूल फांक रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार और विभागीय अफसरों के बीच मिलीभगत से यह स्थिति बनी है।

ग्रामीणों ने मांग है कि प्रशासन तत्काल अधूरे काम को पूरा करवाए और जिम्मेदारों पर कार्रवाई करे, वरना ग्रामीण आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

हम जवाब चाहते हैं
टंकी तो खड़ी कर दी, पर पानी का नामोनिशान नहीं है। ढाई साल बीत गए, अब जनता जवाब चाहती है।
स्थानीय ग्रामीण, ग्राम मैलबेड़ा

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