उपेक्षित और अनदेखा पड़ा है एक हजार साल पुराना शिवलिंग!



अर्जुन झा-
जगदलपुर रत्नगर्भा बस्तर की धरा सिर्फ खनिज और वन संपदा की ही प्रचुरता लिए हुए नहीं है, बल्कि यहां की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत भी यह धरा अपने दामन में समेटे हुए है। यहां की अनेक आध्यात्मिक और धार्मिक धरोहरें जहां जग विख्यात हैं, वहीं कई गुमनाम हालत में हैं कई प्राचीन धार्मिक स्थल उपेक्षा और अनदेखी का शिकार हैं। इन्हीं उपेक्षित धरोहरों में शामिल है बस्तर के विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात के समीप स्थित सिदईगुड़ी का प्राचीन शिवलिंग। छत्तीसगढ़ का नियाग्रा वाटरफॉल कहे जाने वाले चित्रकोट जल प्रपात को तो देश विदेश के लोग जानते हैं, क्योंकि वह आंखों को सुकून देता है, मगर मन को शांति देने वाले और तन मन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देने वाली छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर से बस्तर से इतर शेष दुनिया के लोग पूरी तरह अनजान हैं।


पहले मन में बस्तर का नाम आते ही पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती थी। बाहरी दुनिया के लोग इसे खून खराबे वाली धरती मानते रहे हैं, मगर अब यह मिथक टूट चुका है। नक्सलवाद के खात्मे के बाद बस्तर अब शांति का टापू बन चुका है। यहां अनगिनत पर्यटन स्थल और प्रचुर खनिज एवं वन संपदा है, जो बस्तर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बस्तर की धरती सिर्फ खनिज और वन संपदा से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि यहां ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के सैकड़ों स्थल भी हैं, जो बस्तर की आदिम सभ्यता के गवाह हैं। राजधानी रायपुर से 335 किमी दूर और संभाग मुख्यालय जगदलपुर से 35 किमी दूर विश्वप्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात के समीप स्थित सिदईगुड़ी का प्राचीन एवं विशाल मानव निर्मित शिवलिंग छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय प्रतीक है। इतिहासकारों के अनुसार यह शिवलिंग 11वीं शताब्दी में चक्रकोट (वर्तमान बस्तर) पर शासन करने वाले छिंदक नागवंशी शासकों द्वारा स्थापित कराया गया था।पुरातत्व विभाग के अनुसार यह लगभग एक हजार वर्ष पुराना मंदिर है। इस पूर्वाभिमुखी मंदिर में गर्भगृह है जिसमें बड़ा सा शिवलिंग वर्गाकार जलाहरी पर स्थापित है। यह मंदिर चित्रकोट जलप्रपात से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है जो कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है। बस्तर सांसद महेश कश्यप के मीडिया प्रतिनिधि रोहन कुमार ने बताया कि यह शिवलिंग अपनी भव्यता, प्राचीन स्थापत्य कला एवं धार्मिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है। माना जाता है कि यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा मानव निर्मित शिवलिंग है। यहां महाशिवरात्रि के अवसर पर हर साल तीन दिवसीय मेले का भव्य आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं पर्यटक शामिल होते हैं। इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर ओमप्रकाश सोनी ने बताया चित्रकोट जलप्रपात देश विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। अधिकांश श्रद्धालु एवं पर्यटक इस प्राचीन शिवलिंग और इसके गौरवशाली इतिहास से परिचित हों इस हेतु इसका व्यापक स्तर प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए। ताकि लोगों को क्षेत्र के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की जानकारी मिल सके तथा धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सके।

सनातनी हैं आदिवासी भी
बस्तर शुरू से आदिवासियों की धरती है। यहां के आदिवासी जल, जमीन और जंगल के सहारे अपनी आजीविका चलाते आए हैं। बड़ा देव यानि शिवजी के उपासक आदिवासी मूलतः सनातनी हैं। इस बात के प्रमाण उन्हीं के पूर्वजों द्वारा स्थापित देवी देवताओं के मंदिर हैं। दंतेवाड़ा में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा जिले के ही बारसूर में एक पहाड़ की चोटी पर स्थापित विश्व की सबसे विशाल पत्थर से निर्मित भगवान गणेशजी की प्रतिमा, सुकमा जिले के रामाराम स्थित भगवान श्रीरामचंद्र जी का मंदिर, कलकल बहती माता शबरी के नाम की नदी, कांकेर का कंकालीन माता मंदिर जैसे दर्जनों धार्मिक स्थलों को यहां के आदिवासी पूर्वजों ने ही बनवाया है। बाद में बस्तर में आ बसे विजातीय लोगों ने सनातन धर्म में फूट डालने के लिए आदिवासियों को सनातन से अलग धर्म बताना शुरू कर दिया। आदिवासी समुदाय के एक तबके ने विजतियों के चल प्रपंच में आकर खुद को सनातन धर्म से अलग मानना शुरू कर दिया। जबकि जिस बड़ा देव को आदिवासी पूरी श्रद्धा के साथ पूजते हैं, उन्हीं भोलेनाथ के पुत्र भगवान गणेश जी की कई प्राचीन प्रतिमाएं बस्तर की धरती पर स्थापित हैं। इस बात में कोई शक नहीं कि इन प्रतिमाओं को भी आदिवासी पूर्वजों ने बनाकर स्थापित किया है।माता शबरी भी आदिवासी थी, जिन्होंने भगवान राम को जूठे बेर खिलाए थे। दूसरे धर्म के लोगों ने सनातन धर्म को तोड़ने के गणेश चतुर्थी पर्व, होली, दिवाली त्यौहार मनाने से भी आदिवासियों को रोकने की चाल चली।

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