रावण तो हर साल जलता है, फिर भी क्यों नहीं रुकता सीता का हरण?



लेखिका: नम्रता सिंह (उर्मिला फाउंडेशन, रायपुर एवं उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल रायपुर भाटापारा की हेड)
“सियावर रामचंद्र की जय!”
“उमापति महादेव की जय!”
“राधा रमणीय कृष्ण कन्हैया की जय!”
“पार्वती पतये, हर-हर महादेव!”
इन जयघोषों को सुनकर मन को एक अद्भुत शांति मिलती है। ऐसा लगता है मानो भारतीय संस्कृति की आत्मा इन शब्दों में समाहित हो। इन उद्घोषों में कहीं सीता के साथ राम हैं, कहीं पार्वती के साथ महादेव और कहीं राधा के साथ कृष्ण। हमारी परंपराएं हमें स्मरण कराती हैं कि नारी केवल किसी की सहचरी नहीं, बल्कि प्रेम, शक्ति, श्रद्धा और सृजन का आधार है।
लेकिन इन्हीं जयघोषों के बीच मन में एक सवाल उठता है—क्या रावण के पुतले को जलाने मात्र से सीता का हरण बंद हो जाएगा? क्या दशहरे पर बुराई के प्रतीक रावण का अंत होते ही नारी के प्रति सम्मान की शुरुआत हो जाती है? हर वर्ष दशहरा आता है। मैदानों में रावण के विशाल पुतले खड़े किए जाते हैं। जमकर आतिशबाजी होती है, जयघोष गूंजते हैं और हजारों लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं। साल दर साल रावण के पुतले की ऊंचाई बढ़ती जाती है, लेकिन समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न आज भी खड़ा है—जब रावण हर साल जलता है, तो फिर नारी के विरुद्ध अपराध क्यों नहीं रुकते? कहीं बेटियों पर तेजाब से हमला होता है, कहीं सामूहिक दुष्कर्म जैसी जघन्य घटनाएं सामने आती हैं, तो कहीं किसी महिला की अस्मिता को कुचलने के लिए उसके बच्चों तक को निशाना बनाया जाता है। अपहरण, हिंसा और हत्या जैसी घटनाएं हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर हमारी पूजा, हमारे संस्कार और हमारे सामाजिक मूल्य कहां कमजोर पड़ रहे हैं? क्या हमारी आस्था केवल उत्सवों तक सीमित रह गई है? हम देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाते हैं, लेकिन जीवित नारी के सम्मान के सामने हमारी संवेदनाएं मौन क्यों हो जाती हैं? सच तो यह है कि रावण का पुतला जलाना आसान है, लेकिन अपने भीतर छिपे अहंकार, वासना, हिंसा और स्त्री के प्रति हीन दृष्टिकोण को जलाना कहीं अधिक कठिन है। असली रावण वह मानसिकता है, जो नारी को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के बजाय केवल एक वस्तु समझती है; जो उसकी इच्छा को महत्व नहीं देती, उसकी भावनाओं को अनदेखा करती है और उसकी स्वतंत्रता को अपनी सत्ता के विरुद्ध मानती है। आखिर पुरुष यह क्यों भूल जाता है कि नारी की भी अपनी इच्छाएं हैं, अपने सपने हैं, अपनी भावनाएं हैं और अपना आत्मसम्मान है? उसका जीवन किसी दूसरे की इच्छा के अधीन रहने के लिए नहीं है। नारी का सम्मान किसी की कृपा नहीं, उसका अधिकार है।जिस नारी को हम मां कहकर पूजते हैं, वही किसी की बहन, किसी की बेटी, किसी की पत्नी और किसी की मित्र भी है। लेकिन क्या सम्मान पाने के लिए उसका इन रिश्तों में से किसी एक से जुड़ा होना आवश्यक है? क्या किसी अनजान महिला की गरिमा इसलिए कम हो जाती है कि वह हमारी बहन या बेटी नहीं है? नारी का सम्मान उसके रिश्ते से नहीं, उसके इंसान होने से होना चाहिए। यदि हम वास्तव में एक सभ्य और सुरक्षित समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपने घरों से शुरुआत करनी होगी। बेटों को बचपन से सिखाना होगा कि सहमति का सम्मान करना, महिलाओं की स्वतंत्रता स्वीकार करना और किसी भी प्रकार के उत्पीड़न का विरोध करना ही सच्चे संस्कार हैं। परिवार, विद्यालय, समाज और कानून सभी को मिलकर ऐसी मानसिकता के विरुद्ध खड़ा होना होगा, जो नारी को कमजोर समझती है। इस दशहरे पर आइए, केवल रावण के पुतले का दहन न करें, बल्कि अपने भीतर बैठे उस रावण को भी पहचानें, जो नारी के सम्मान को चुनौती देता है। संकल्प लें कि किसी महिला के साथ अन्याय होते देखकर चुप नहीं रहेंगे, बेटियों को भय नहीं बल्कि आत्मविश्वास देंगे और बेटों को अधिकार नहीं, जिम्मेदारी का अर्थ समझाएंगे। क्योंकि जिस दिन नारी को देवी के रूप में पूजने के साथ-साथ एक मनुष्य के रूप में सम्मान भी मिलने लगेगा, उसी दिन दशहरे का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। याद रखिए, रावण का पुतला जलाने से परंपरा पूरी होती है, लेकिन नारी का सम्मान करने से समाज संस्कारित होता है। इस बार रावण बाहर नहीं, अपने भीतर जलाइए। क्योंकि नारी का सम्मान ही सच्चे अर्थों में बुराई पर अच्छाई की विजय है।

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